जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद (3 जनवरी 1889 – 15 नवंबर 1937ई०)

जन्म: 1889 ई० काशी के गोवर्धनसराय में हुआ था। उनका परिवार ‘सूंघनी साहू’ के नाम से जाना जाता है।

निधन: 1937 ई०

पिता: देवीप्रसाद और माता का नाम मुन्नी देवी था।

उपनाम:

  • बचपन का नाम ‘झारखंडी’
  • ‘आधुनिक कविता के सुमेरु’
  • इलाचंद्र जोशी और डॉ गंपतिचंद्र ने इन्हें ‘छायावाद का जनक’ माना।
  • इन्हें भारतीय संस्कृति का पूनरुद्धारक भी कहा जाता है।
  • ब्रजभाषा में ‘कलाधर’ नाम से कविताएँ लिखते थे।

इनके तीन गुरु थे-

  • मोहिनीलाल से इन्होने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया था।
  • रसमयसिद्ध से अध्यात्मक का ज्ञान प्राप्त किया।
  • दीनबंधु मिश्र से इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया।
  • नौ वर्ष की अवस्था में इन्होने एक ‘सवैया’ लिखकर अपने गुरु रसमयसिद्ध को सुनाया था। जो वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं है।

रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार:

  • इनकी प्रथम कविता- ‘सावन पंचक’ 1906 ई० में भारतेंदु पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
  • प्रथम छायावादी कविता ‘प्रथम प्रभात’ 1913 ई० में प्रकाशित हुई थी।

महत्वपूर्ण रचना कविताएँ:

उर्वशी (1909 ई०)

वनमिलन (1909 ई०)

विदाई (1909 ई०)

नीरव प्रेम (1909 ई०)

कल्पना का सुख (1909 ई०)

अयोध्या का उद्धार (1910 ई०)

बभ्रुवाहन (1911ई०)

प्रसिद्ध काव्य संकलन:

प्रेमपथिक (1905 ई०) प्रथम काव्य संकलन है।

आरम्भ में इसमें ‘ब्रजभाषा’ और ‘खड़ीबोली’ दोनों की मिश्रित कविताएँ थी।

सन् 1913 ई० में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसमे केवल ‘खड़ीबोली’ की कविताएँ रखी गई थी।

करुणालय (1913 ई०) यह हिन्दी का प्रथम ‘गीतिकाव्य’ है।

कानन-कुसुम (1913 ई०)

महाराणा का महत्व (1914 ई०)

झरना (1918 ई०) इसे छायावाद की प्रयोगशाला का प्रथम अविष्कार कहा जाता है।

चित्राधार (1918 ई०)

आँसू (1925 ई०) यह खण्डकाव्य है। इसमें 133 छंद है। इसे हिन्दी का ‘मेघदूत’ भी कहा

जाता है।

लहर (1933 ई०)

कामायनी (1935 ई०)

प्रमुख नाट्य रचनाएँ:

सज्जन (1910 ई०) यह पहला नाटक है।

कल्याणी परिणय (1912 ई०)

करुणालय (1913 ई०)

प्रायश्चित (1913 ई०)

राज्य श्री (1914 ई०)

विशाखा (1921-22 ई०) यह जयशंकर प्रसाद का प्रथम प्रौढ़ नाटक है।

अजात शत्रु (1922 ई०)

जनमेजय का नागयज्ञ (1926 ई०)

कामना (1927 ई०)

स्कंदगुप्त (1928 ई०)

एक घूँट (1929 ई०) 

चन्द्रगुप्त (1931 ई०)

ध्रुवस्वामिनी (1933 ई०)

अग्निमित्र (अपूर्ण)

महत्वपूर्ण उपन्यास:

कंकाल (1929 ई०)

तितली (1934 ई०)

इरावती (अपूर्ण) 1961 ई० में निराला जी ने इसे पुरा किया था।

महत्वपूर्ण कहानी संकलन:

इनके कूल 69 कहानियाँ है, जो 5 कहानी संकलन में संकलित  है।

छाया (1912 ई०)

प्रतिध्वनि (1926 ई०)

आकाशदीप (1929 ई०)

आँधी (1931 ई०)

इंद्रजाल (1936 ई०)

निबंध संग्रह: काव्य कला व अन्य निबंध (1936 ई०)

विशेष तथ्य:

‘कनान-कुसुम’ (1913 ई०), यह जयशंकर के खड़ीबोली की कविताओं का पहला संकलन है।

‘झरना’- प्रथम छायावादी काव्य संकलन है।

‘अयोध्या का उद्धार’, ‘वन मिलन’ और ‘प्रेम राज्य’ ये तीनों लम्बी कविताएँ है। ये तीनों ‘चित्राधार’ काव्य संकलन में संकलित है।

‘प्रथम प्रभात’ (1913 ई०) प्रसाद की पहली छायावादी कविता ‘झरना’ काव्य संकलन में संकलित है।

लहर काव्य संकलन में चार लम्बी कविताएँ संकलित है- अशोक की चिंता, शेर सिंह का शस्त्र समर्पण, पेशोला की प्रतिध्वनि और प्रलय की छाया।

‘झरना’ काव्य संकलन में कविताओं की संख्या 58 है।

‘प्रेमपथिक’ पर गोल्ड स्मिथ की रचना ‘हरमीट’ का प्रभाव है।       

कामायनी (1935 ई०)

कथानक: शतपथ ब्राहमण ग्रंथ पर है। मत्स्यपुराण, ऋग्वेद से भी लिया गया है।

काव्यरूप- प्रबंधक महाकाव्य है।

रस- इसमें शांतरस प्रधान है।

मुख्य छंद- ‘त्राटक’ यह मात्रिक छंद है। इसमें 30 मात्राएँ होती है। इसमें 16 और 14 मात्राओं पर यति होता है। इस छंद को लावणी छंद के नाम सभी जाना जाता है।

कामायनी में 15 सर्ग हैं प्रथम सर्ग ‘चिंता’ (सबसे बड़ा) है, अंतिम सर्ग ‘आनंद’ (सबसे छोटा) है। कामायनी में मंगलाचरण नहीं हुआ है।

इसमें सर्गों का नामकरण मनोविकारों के आधार पर रखा गया है।

पात्र: चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इडा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शंन, रहस्य, आनंद  

मुख्य पात्र:

मनु- जो मन का प्रतीक है।

श्रद्धा- हृदय का प्रतीक है।

इड़ा– बुद्धि का प्रतीक है।

मानव/कुमार- मानव जाती का प्रतीक है।

कैलास मानसरोवर- मुक्तिस्थल का प्रतीक है।

कामयानी का मुख्य दर्शन:

‘शैव दर्शन के प्रत्यभिज्ञा वाद’ को कामायनी में प्रतिष्ठित किया गया है।

इसका मुख्य संदेश ‘अहिंसा’ का है।

समानता और समरसतावाद का संदेश है।

“औरों को हँसते देखों मनु, हँसो और सुख पाओं।

अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओं।”

समन्वयवाद का संदेश है:

“ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न, इच्छा क्यों पूरी हो मन की।

एक दूसरे से मिल न सके, यह विडंबना है जीवन की।”

इसमें नारी की महत्ता का चित्रण है:

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।

प्यूस स्त्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।”

सूक्ष्म सौंदर्य का चित्रण है:

“खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ वन बीच गुलाबी रंग।”

कामायनी के विषय में विशेष तथ्य:

शांतिप्रिय दिवेदी ने कामायनी को ‘छायावाद का उपनिषद’ कहा है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल व नंददुलारे वाजपेयी ने कामायनी को ‘मानवता का रसात्मक इतिहास’ कहा है।

मुक्तिबोध के अनुसार- “कामायनी एक ‘फैंटेसी’ है।”

डॉ इन्दुनाथ मदान के अनुसार- “कामायनी एक असफल कृति है।”

डॉ नामवर सिंह के अनुसार- “कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि काव्य है।”

नंददुलारे वाजपेयी के अनुसार- “कामायनी नये युग का काव्य है।”

प्रेमशंकर के अनुसार- “कामायनी में मानव जीवन की सुंदर अभिव्यक्ति है।”

प्रेमशंकर के अनुसार- “कामायनी छायावाद कई प्रतिनिधि रचना है।”

कामायनी के चिंता सर्ग का कुछ भाग 1928 ई० में सुधा नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने दोष रहित, दोष सहित नामक निबंध में कामायनी को आधी कविता माना है।

कामायनी के लिए 1936 ई० में जयशंकर प्रसाद को ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ दिया गया।     

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