आदिकाल (लौकिक साहित्य) : इकाई- 2

हिन्दी साहित्य के आरंभिक काल (आदिकाल) में जैन और सिद्ध साहित्य का सृजन धर्माश्रय तथा रासो साहित्य का सृजन राज्याश्रय में हुआ। इस कारण वे बच गए। परन्तु इन दोनों के अलग कुछ लोक साहित्य का भी सृजन हुआ। जो लोकाश्रित होने के कारण संरक्षित नहीं हो सका।

रचना: ढोल मारू-रा-दुहा

मूल रचनाकार: कल्लोल

रचनाकाल: 1453 ई०

इसकी मूल रचना लुप्त हो गई थी। यह बिकानेर के आस-पास केवल गेय परम्परा में उपलब्ध थी। 1561 ई० में जैन कवि ‘कुशललाभ राय’ कथावाचक ने इसके पदों का संकलन किया। मूल रचना दोहा छंद में था। 1934 ई० में तीन विद्वानों- रामसिंह, सूर्य करण पारीक और नरोत्तम स्वामी ने इनके पदों का संपादन कर इसे नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित करवाया।

कथानक: इसका नायक ढोला (उपनाम है) है। ढोला का मूल नाम साल्हकुमार है। यह (ढोला) जयपुर के कछवाहा वंश के शासक नल का पुत्र था। बचपन में ही इसका विवाह मारवणी के साथ हो गया था। उस समय ढोला का उम्र 3 वर्ष का था। इसकी नायिका मारू थी। मारू का मूल नाम (मारवणी) था। यह पूगल (बीकानेर) देश की राजकुमारी थी। नायिका का उम्र डेढ़ वर्ष का था। युवा होने पर राजकुमारी मारवणी अपने बचपन के पति ढोला के विषय में सुनती है और उसके विरह में व्याकुल हो जाती है। वह ढोला का पता लगाने के लिए अनेक संदेशवाहक भेजती थी, लेकिन कोई भी वापस नहीं आता है। ढोला ने राजकुमारी मालवणी से दूसरा विवाह कर लिया था। मालवणी, मारवणी का कोई भी सदेश ढोला तक पहुँचने नहीं देती है। राजकुमार अपने बचपन में हुए शादी को भूल चुके थे। दूसरी रानी को इस बात का डर था कि राजकुमार उसे छोड़कर चले जाएंगे। अचानक राजकुमार को उसके पहली पत्नी ढोला के बारे में पता चलता है। वह उसे लेने के लिए ऊँट से पूंगल पहुँच जाता है। ढोला और मारवाणी का मिलन होता है। मारवाणी को ढोला अपना प्यार और स्नेह समर्पित करता है।

विशेष तथ्य:

  • इसके कूल 788 छंद है।
  • काव्य मुक्तक है।
  • भाषा राजस्थानी, शैली-डिंगल है।
  • मुख्य रस वियोग है। (अल्प रूप संयोग श्रृगार है)
  • इसमें छंद दोहा/दूहा है।
  • कुछ चौपाइयाँ भी है, जिसे कुशललाभ ने जोड़ी है।
  • यह प्रेमगाथात्मक गेय रचना है। इसके पद बीकानेर के आसपास गाए जाते है।
  • इस क्षेत्र में रचना के विषय से संबंधित एक प्रसिद्ध उक्ति है।

“सोरठियों दूहो भलो, भली मरवण-री बात

जोबन छाई धण भली, तारा छाई रात।”

कथन:

आचर्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- “राउलबेल से जो श्रृंगारिक परंपरा हिन्दी में आरम्भ हुई थी उसका विकसित रूप ढोल- मारु-रा दोहा में देखा जा सकता है।”

मोतीलाल मेनारिया के शब्दों में- “राउलबेल से जो श्रृंगारिक परंपरा हिन्दी में आरम्भ हुई उसे ढोला-मारू-रा दूहा से एक नई दिशा प्राप्त हुई है। उतरोत्तर लोगों की रूचि परिष्कृत होती चली गई।” (इसमें मांसल सौंदर्य का वर्णन है)।

आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी के शब्दों में- “ढोला-मारू-रा दोहा में हेमचन्द्र व बिहारी के पदों के बीच के योजक कड़ी है।”

ढोला-मारू-रा दोहा के प्रमुख पद:

कागज नहि कि मास नहि लिखता आलस चाई।

कहँ उण देस संदेसडई मोलई बढई बिकाई।।

राति ज सूनि निसह भरी सुणी महाजन लोई।

हाथारी छाला पड्या चीर निचोई निचोई।।

आडा डूंगर बण घणां खड़ा पियारा मीत।

देह विधाता पंखुड़ी मिलि  मिलि आवउ नि।।

रचना: बीसलदेव रासो

रचनाकार: नरपति नाल्ह यह एक प्रेम काव्य है

इस रचना में अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज (बीसलदेव) तथा भोज परमार की पुत्री राजमती के विवाह, वियोग एवं पुनर्मिलन की कथा है। राजा बीसलदेव अपनी नव विवाहिता रानी राजमती के व्यंग्य बाणों से रुष्ट होकर उड़ीसा चले जाते है वे 12 वर्ष तक लौटकर नहीं आते है। पति के वियोग में रानी एक पंडित के द्वारा अपने पति बीसलदेव को संदेश भेजती है। अन्त में बीसलदेव के लौटकर आने पर दोनों का पुनर्मिलन होता है।

  • सम्पूर्ण कथा 120 छंदों और 4 खण्डों में है।
  • इसमें श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों का वर्णन है।
  • इसमें प्रेषित पतिका की विरह व्यंजना बड़ी मार्मिक है।

रचना: बसंत विलास, इसमें कूल 84 दोहे है।

रचनाकाल: डॉ माताप्रसाद गुप्त के अनुसार 13वीं से 14वीं शदी के मध्य माना जाता है।

रचनाकार: अज्ञात है। यह सर्वश्रेष्ठ अलौकिक रचना मानी जाती है

इसमें बसंत ऋतु के मादक प्रभाव का चित्रण किया गया है।

डॉ रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’ के शब्दों में- “इस रचना में स्त्री, पुरुष और प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन है। इसकी भाषा सरस ब्रजभाषा है जिसका विकास परवर्ती भक्तिकालीन कृष्णकाव्य में और रीतिकाव्य में दिखाई देता है।

रचना: ‘राउलवेल’, यह चम्पू काव्य है। 

रचनाकार: रोढा नाम का कवि माना जाता है। 

रचनाकाल: दसवीं, ग्यारहवी शताब्दी माना जाता है।

  • इसकी रचना ‘राउल’ नाम की नायिका के नखशिख वर्णन से शुरू होता है।
  • कवि ने आरम्भ में राउल के सौंदर्य का वर्णन पद्य और बाद में गद्य का प्रयोग किया है।
  • इसकी भाषा में हिन्दी के सात बोलियों के शब्द मिलते हैं, जिनमे राजस्थानी प्रधान है।
  • इस रचना का मूलपाठ मुंबई के ‘प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम’ में सुरक्षित है।
  • सर्वप्रथम इसे भायाणी ने संपादित किया। बाद में माता प्रसाद गुप्त ने इसका प्रमाणिक पाठ संपादित करवाया।

रचना: ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’

रचनाकार: पंडित दामोदर शर्मा द्वारा रचित व्याकरण का प्रथम ग्रंथ है।

रचनाकाल : 12 वीं शताब्दी का महत्वपूर्ण ‘व्याकरण ग्रंथ’ माना जाता है।

रचना: वर्णरत्नाकर मैथिली और हिन्दी में रचित यह महत्वपूर्ण गद्य ग्रंथ है।

रचनाकार: ज्योतिरीश्वर ठाकुर (मैथिल कवि) थे।

रचनाकाल: आचार्य हजारीप्रसाद द्वेवेदी के मतानुसार इसकी रचना 14वीं शताब्दी में हुई होगी।

  • यह एक शब्दानुकोशनुमा ग्रंथ है।
  • यह रचना 8 कल्लोल में विभाजित है।
  • इसमें अवहट्ठ शब्द का प्रयोग मिलता है।   
  • इसकी भाषा कवित्, अलंकारिक तथा शब्दों में तत्सम की प्रवृतियाँ मिलती है। हिन्दी गद्य के विकास में ‘राउलवेल’ के बाद ‘वर्णरत्नाकर’ का योगदान भी है।

रचना: विद्यापति की ‘पदावली’

रचनाकार: विद्यापति

यह विभिन्न समय में लिखे गए मुक्त पदों का संकलन है। जो लोक भाषा मैथिली में लिखी गई है, कुछ लोग इसे ‘ब्रजबुलि’ कहते हैं। विद्यापति ने जयदेव के ‘गीतगोविन्द’ से प्रभावित होकर मधुर और कोमलकांत पदों में विभिन्न रागों में गाने के लिए इसे लिखा। इस कृति के माधुर्य और गेयता के कारण विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ कहा गया है। इस पदावली को हिन्दी गीत परम्परा में विशेष स्थान मिला है। इसकी हस्तलिखित प्रतियाँ नेपाल दरबार के पुस्तकालय में संरक्षित है। इसके कई संस्करण निकले हैं। पदों की संख्या सबमे सामान नहीं है। सर्वाधिक संख्या नगेन्द्रनाथ गुप्त द्वारा संकलन में 245 पद है।    

अमीर खुसरो

  • अमीर खुसरो का मूल नाम: यमुनुद्दीन अबुल हसन था।
  • खुसरो का जन्म: 1255 ई० निधन 1329 ई०  

खुसरो के उपनाम:

  • तुर्क-ए-अल्लाह: अल्लाहदीन खिलजी ने कहा
  • तोता-ए-हिन्द:
  • तूती-ए-हिन्द: खुसरो ने अपने आप को कहा है।
  • अमीर खुसरो के गुरु: चिश्ती निजामुद्दीन औलिया थे।
  • ईश्वरी प्रसाद ने अमीर खुसरो को ‘महाकवि’ और ‘कवियों का राजकुमार’ कहा है।  

रचनाएँ: खालीकबारी, नुहसिपहर, हालत-ए-कन्हैया, पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सखुने, नजरान-ए-हिन्द, गजल

खालीकबारी: यह शब्दकोष संबंधी रचना है। इसे पर्यायवाची शब्दोकोश भी कहा जाता है। वर्णमाला के एक-एक वर्ण के माध्यम से सूफ़ी सिद्धांतों की विवेचना किया गया है। इसमें तुर्की अरबी फ़ारसी व हिन्दी के पर्यायवाची शब्दों को शामिल किया गया है।

नुहसिपहर: भारतीय बोलियों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है।

पहेलियाँ: “चारों थाल मोतियों से भरा, सबके ऊपर औंधा धरा।

      चारों तरफ वह थाल फिरै, मोती एक भी नीचे न गिरे।।”  

मुकरियाँ: “जब मेरे मंदिर में आवे, सोते मुझको आन जगावे।

पढ़त फिरत वाग विरह के अच्छर ए सखि साजन ना सखि मच्छर”

दो सकुने: पान सड़ा क्यों? घोड़ा अड़ा क्यों? (फेरा ना था)

ब्राहमण प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों? (लोटा न था)

ढ़कोसला: “खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चलाय।

आया कुत्ता कहा गया तु बैठी ढ़ोल बजाय”।।

अमीर खुसरो के विशेष तथ्य:

  • हिन्दी भाषा के लिए हिंदवी शब्द का प्रयोग सबसे पहले अमीर खुसरो ने ही किया था।
  • डॉ रामकुमार वर्मा ने इन्हें अवधी भाषा का प्रथम कवि माना हैं।
  • अमीर खुसरो ने दिल्ली के 11 सुल्तानों का उत्थान पतन देखा था।
  • फ़ारसी और हिन्दी के मिश्रित छंदों में कविता करने वाले अमीर खुसरो पहले कवि है।
  • आदिकाल में मनोरंजक साहित्य लिखने वाले एकमात्र कवि अमीर खुसरो थे।

अमीर खुसरो के विषय में विद्वानों के विशेष कथन:

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में: इनकी पहेलियाँ मुकरियाँ प्रसिद्ध है, जिनमे उक्ति वैचित्र्य की प्रधानता है। यद्यपि रसीले गीत व दोहे भी इन्होने लिखे है।”
  • खुसरो की भाषा के दो रूप है:

पहला खड़ी बोली: पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सकुने ग्रामीण ठेठ खड़ी बोली में है। दूसरा फ़ारसी मिश्रित ब्रज भाषा: गजल और गीत

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