आदिकाल (सिद्ध साहित्य) : इकाई- 2

बौद्धधर्म अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं में विभाजित हुआ। महायान और हीनयान। महायान शाखा से वज्रयान और सहजयान शाखाएँ पनपी। सहजयान के अनुयायी सिद्ध कहलाए। सिद्ध शब्द से अभिप्राय है- साधना में दक्ष साधक। जिन्होंने विलक्षण सिद्धियाँ प्राप्त कर लिया हो। वह अपनी मंत्र शक्ति से चमत्कार पैदा कर सकता है वही सिद्ध है।

  • बौद्धधर्म महात्मा बुद्ध के उपरान्त दो शाखाओं में बट गया। पहला हीनयान और दूसरा महायान। महायान भी दो भागों में बट गया। सहजयान और वज्रयान।
  • इन्हीं वज्रयान कवियों के द्वारा रचा गया साहित्य, सिद्ध साहित्य के नाम से जाना जाता है।     

परिभाषा: आदिकाल में बौद्धधर्म की महायान शाखा के वज्रयान कवियों के द्वारा अपनी धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए सामान्य लोगों की भाषा में जो साहित्य लिखा गया। उसे सिद्ध साहित्य के नाम से जाना गया।

  • सिद्धों का चरम उत्कर्ष काल 8वीं से 10वीं शताब्दियों के मध्य था।
  • सिद्धों का प्रमुख केन्द्र श्रीपर्वत, अर्बुदपर्वत, तक्षशिला, नालंदा, असम, और बिहार था।
  • सिद्धों को पालवंश का संरक्षण प्राप्त था।
  • सिद्ध बाद में मुस्लिम अक्रमाणकारियों से त्रस्त और दुखी होकर ‘भोर’ देश अथार्त नेपाल, भूटान, तिब्बत की ओर चले गए।
  • सिद्धों के विषय में सबसे पहले जानकारी ज्योतिरीश्वर ठाकुर की रचना ‘वर्णरत्नाकर’ से मिलती है।
  • सिद्धों की रचनाओं की खोज पहले हरप्रसाद शास्त्री ने नेपाल से किया था। सिद्धों की वाणियों का संकलन 1917 ई० में बौद्ध गान और दोहा के नाम से बांग्ला भाषा में किया गया।
  • सिद्धों के विषय में विशेषकर विस्तृत और विवेचनात्मक जानकारी सबसे पहले राहुल सांकृत्यायन ने ‘हिन्दी काव्य धारा’ में जो 1945 ई० में प्राप्त हुई थी।
  • राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध साहित्य का आरम्भ सरहपा से माना है। इनका (सरहपा) समय 769 ई० के लगभग माना है।
  • सांकृत्यायन ने सिद्धों की संख्या 84 माना है।
  • इन सिद्धों में 80 पुरुष और 4 स्त्रियाँ थी। कनखलापा, लक्ष्मीकरा, मणिभद्रा, मेखलापा।
  • वे सिद्ध कवि जो नाथ साहित्य में भी आते है: मत्स्येंद्रनाथ (मच्छंदरनाथ), जालान्धर नाथ, नागार्जुन, चर्पटनाथ और गोरखनाथ।

सिद्ध साहित्य का विशेष तथ्य:

  • सिद्धों की भाषा रहस्यात्मक थी। सामान्य लोगों को कुछ समझ में आता था कुछ समझ में नहीं आता था।
  • मुनि अद्यव्रज ने सिद्धों की भाषा को ‘संध्या’ या ‘संघा’ भाषा कहा है।
  • हरप्रसाद शास्त्री ने इनकी भाषा को ‘आलो’ (उजाला) ‘आंधारी’ (अंधेरा) भाषा कहा है।
  • सिद्धों की भाषा अपभ्रंश का विकसित रूप तथा हिन्दी का आरंभिक रूप था।
  • सिद्धों ने निराश जनता में उत्साह का संचार किया। इसकी प्रशंसा करते हुए हजारी प्रसाद द्वेवेदी ने लिखा है- “जो जनता तत्कालीन नरेशों (राजाओं) की स्वेच्छाचारिता, पराजय या पतन से त्रस्त होकर निराशावाद के गर्त में गिरी हुई थी। उसके लिए इन सिद्धों की वाणी ने संजीवनी बूटी का काम किया।”
  • ‘उलटबाँसियाँ’ का आरंभिक रूप सबसे पहले सिद्ध साहित्य में ही मिलता है।

प्रमुख सिद्ध और उनकी रचनाएँ:

सरहपा (7वीं 8वीं शताब्दी), 

शबरपा (8वीं शताब्दी),

लुइपा (8वीं शताब्दी),

कन्हपा (9वीं शताब्दी),

गोरक्षपा (10वीं शताब्दी),

कालपा (11वीं शताब्दी),

कुंडलीपा (11वीं शताब्दी) मानी जाती है।      

गुरु शिष्य परंपरा की दृष्टि से: सरहपा, सबरपा, लुइपा

समय की दृष्टि से: लुइपा सरहपा सबरपा

सरहपा: इनके जन्म-स्थान विवादास्पद है।

  • एक तिब्बती जनश्रुति के अनुसार उनका जन्म स्थान ‘उड़ीसा’ में था। एक और जनश्रुति के अनुसार उनका जन्म स्थान सहरसा भागलपुर जिले के पंचगछिया ग्राम बताया जाता है।
  • राहुल सांकृत्यायन ने इनका जन्म स्थान नालंदा और प्राच्य देश की राज्ञीनगरी के भंगल (भागलपुर) या पुंड्रवद्र्धन प्रदेश में होने का अनुमान लगाया है।
  • सरहपा को कोशी अंचल का कवि माना जाता है।   
  • विषयवस्तु और कलापक्ष की दृष्टि से सरहपा को सिद्ध साहित्य का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है।
  • सरहपा को बौद्ध धर्म की वज्रयान और सहजयान शाखा का प्रवर्तक तथा आदि सिद्ध कवि माना जाता है।
  • राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें हिन्दी का प्रथम कवि माना है।
  • सरहपा को कई नामों से जाना जाता है-

इनके नाम में सरोरुह, बज्र, सरोबज्र, राहुलभद्र, सरोजवज्र, शरोरुहवज्र, पद्दम तथा पद्दमवज्र भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि सिद्ध बनने से पहले उनका नाम ‘राहुलभद्र’ था। एक बार उन्होंने ‘शर’ बनाने वाली युवती की मुद्रा बनाई थी। उसके बाद उनका नाम सरहपा हो गया।

  • सरहपा पालवंश शासक धर्मपाल के समकालीन थे। वे ब्राह्मनवादी वैदिक विचारधरा के विरोधी थे।
  • राहुल सांकृत्यायन के अनुसार- सरहपा हरिभद्र नाम के बौद्ध दार्शनिक के शिष्य थे।

सरहपा की रचनाएँ:

इनकी 32 रचनाएँ है। जिसमे ‘दोहाकोश’ सबसे बेहतर मानी जाती है। सरहपा के दोहाकोश की तीन प्रतियाँ उपलब्ध हैं। पहली प्रति में 20 दोहे, दूसरी में 12 दोहे, और तीसरी में 4 दोहे है। 4 सम चतुष्पदियाँ और 2 मुक्तक मिलते है।     

शबरपा का समय 780 ई० माना जाता है। ये सरहपा के शिष्य थे।

  • इनका जन्म क्षत्रिय वंश में हुआ था, किन्तु ‘शबरों’ जाती में जीवन व्यतीत करने के कारण ‘शबरपा’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • शबरपा राजा धर्मपाल के समकालीन थे तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय के प्रधानाचार्य थे।

शबरपा के प्रमुख रचनाएँ:

‘चर्यापद’ (आचरण संबंधी पदों का संग्रह है)

‘महामुद्रा वज्रगीति’ (यह इनकी साधनात्मक रचना थी)

‘वज्रयोगिनी साधना’

विशेष तथ्य:

बाह्य आडंबरो का विरोध करतें हुए सहज जीवन पर बल दिया तथा सहज जीवन को ही महासुख की प्राप्ति का एक मात्र साधना बताया है। इन्होने माया मोह का विरोध किया।

चर्यापाद की प्रमुख पंक्तियाँ:

“छाडू-छाडू माआ मोह विषप दुदोली, महा सुखे विलसंति शबरों लइया गुण महोली।”

चर्तापाद में 106 पद हैं। रचना मुक्तक और दोहा छंद में रचित है।

लुइपा:

  • राहुल सांकृत्यायन और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इनका समय 773 ई० है। यह सर्वमान्य है।
  • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी  के अनुसार इनका समय 830 ई० मान्य नहीं है।
  • लुइपा भी राजा धर्मपाल के समकालीन थे।
  • इनका जन्म एक कायश्त परिवार में हुआ था। ये सबरपा के शिष्य थे।
  • इनकी एक मात्र रचना ‘लुइपादगीतिका’ है।
  • ‘लुइपादगीतिका’ उपदेशात्मक रचना है।
  • इसमें 240 पद है। यह खंडकाव्य है। वार्णिक कथा के माध्यम से सहज जीवन के महत्व को समझाया गया है।

डॉ नगेन्द्र के अनुसार- ‘साधना की दृष्टि से 84 सिद्धों में सबसे ऊँचा स्थान लुइपा का माना जाता है। (अधिक विद्वान इन्ही से सहमत है)

कण्हपा ने अपनी रचना ‘चर्यचार्य विनिश्चय’ में लुइपा को सहज धर्म का प्रथम आचार्य माना है।

लुइपा के साधना का प्रभाव को देखकर उड़ीसा के तत्कालीन शासक दारिकपा (मूल नाम-मोहन और क्षत्रिय थे) और उनके मंत्री डेंगीपा लुइपा के शिष्य बन गए थे।

राहुल सांकृत्यायन ने इनकी दो रचनाओं का उल्लेख किया है- ‘बुद्धोदय’ और ‘अभिसमय विभग’। ये दोनों रचनाएँ वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।

लुइपा गीतिका की प्रमुख पंक्तियाँ:

“काआ तरुवर पंच विडाल, चंचल चिया पइठा काल।

डिढ़ करिअ महासुख परिणाम लई भणई गुरु पुच्छिम जाण”।।

सिद्ध कवियों में सबसे बड़े रहस्यवादी कवि लुइपा थे।

कण्हपा:

  • कण्हपा का समय विवादास्पद है
  • समय विक्रमी संवत् 810 माना जाता है। डॉ रामकुमार वर्मा इससे सहमत नहीं है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ नगेन्द्र, राहुल सांकृत्यायन तथा नागरी प्रचारिणी सभा, काशी 820 ई० माना है। (यह समय सर्वमान्य है)
  • इनका मूल नाम कर्णपा था। कृष्ण वर्ण होने के कारण ये कृष्णपा के नाम से प्रसिद्ध थे।
  • कण्हपा के गुरु का नाम जालंधरपा था। कण्हपा महाराज देवपाल के समकालीन थे
  • डॉ नगेन्द्र के अनुसार इनकी चौहत्तर (74) रचनाएँ मानी जाती है।
  • राहुल सांकृत्यायन इनकी रचनाओं की संख्या 32 मानते हैं। (यही मान्य मत है)।

वर्तमान में उपलब्ध कण्हपा की रचनाएँ निम्न है:

  1. चर्याचर्याविनिश्चय 2. कण्हपाद गीतिका
  2. ‘चर्याचर्याविनिश्चय’ यह दोहा छंद में रचित है।
  3. इसमें 355 छंद है।
  4. यह अपभ्रंश का परवर्ती रूप है।
  5. यह उपदेशात्मक और शांत रस प्रधान रचना है।
  6. काव्य कला की दृष्टि से कण्हपा सिद्धों में सबसे श्रेष्ठ और बड़े कवि थे।

राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में: “कण्हपा पांडित्य और कवित्व में बेजोड़ थे। कण्हपा के पांडित्य और विद्वता से प्रभावित होकर अधिकांश सिद्ध इनके शिष्य बन गए थे।”

डोम्बिपा:

  • अधिकतर विद्वानों ने इनका समय 840 ई० माना है। (यह सर्वमान्य है)
  • इनका जन्म मगध के क्षत्रिय वंश में हुआ था।
  • गुरु: इन्होने दो गुरु बनाया था।
  • इनके पहले गुरु का नाम ‘वीणापा’ तथा दूसरे गुरु ‘वुरुपा’ थे।
  • इनकी कूल 21 रचनाएँ मानी जाती है। (जो सर्वमान्य है)।

रचनाएँ: डोबिगीतिका, अक्षरद्विकोपदेश और योगचार्य इनकी सबसे महत्वपूर्ण रचना अक्षरद्विकोपदेश है

अन्य सिद्ध कवि:                        

कवि का नाम   समयरचनाएँ
कुक्कुरिपाविं सं 897कूल 16 उपलब्ध नहीं है
विरूपाविं सं 897  योगदर्शन सार
दरिकपाविं सं 890दरिकपा रसानुभूति वर्णन

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