‘हरि घास पर क्षण भर’ (कविता) –सच्चितानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (इकाई-5)

‘हरि घास पर क्षण भर’ अज्ञेय जी की एक प्रमुख कविता संग्रह है। इस कविता संग्रह में ‘हरि घास पर क्षण भर’ भी एक कविता है। यह कविता इलाहाबाद में 14 औक्तुबर 1949 में रची गई थी। अज्ञेय प्रयोगवादी कवि थे अतः उनकी कविताओं में प्रयोग का होना स्वाभाविक है। यह कविता अज्ञेय की नई चेतना का प्रतीक है। यह एक प्रकृतिबोध की कविता है। अज्ञेय की कविताओं में प्रकृति का रंग मानव के रंग में रचा बसा हुआ है। प्रकृति के प्रति मानवीय होने की आकांक्षा कवि के हृदय में बसा है। वह प्रकृति की तरह सहज जीवन बिताने पर जोर देते हैं। आज बनावटीपन और औपचारिकता ने मानव के जीवन को कृत्रिम बना दिया है। कवि इस कृतिमता को जीवन से हटाने के पक्षधर हैं। वे इस कविता में मानव को प्रकृति की तरह सहज और सौम्य होने का न्योता देते हुए इस कविता के माध्यम से कहते हैं –    

हरि घास पर क्षण भर (कविता)

आओ बैठें
इसी ढाल की हरी घास पर।

माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,
और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह
सदा बिछी है-हरी, न्यौती, कोई आ कर रौंदे।

आओ, बैठो
तनिक और सट कर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे, बस,
नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ,
चाहे चुप रह जाओ-
हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अन्त:स्मित, अन्त:संयत हरी घास-सी।

क्षण-भर भुला सकें हम
नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट-
और न मानें उसे पलायन;
क्षण-भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे,
फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी-सी चिड़िया-
और न सहसा चोर कह उठे मन में-
प्रकृतिवाद है स्खलन
क्योंकि युग जनवादी है।

क्षण-भर हम न रहें रह कर भी :
सुनें गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में किसी दूर सागर की लोल लहर की
जिस की छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं-
जैसे सीपी सदा सुना करती है।

क्षण-भर लय हों-मैं भी, तुम भी,
और न सिमटें सोच कि हम ने
अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को क्यों माना!

क्षण-भर अनायास हम याद करें :
तिरती नाव नदी में,
धूल-भरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,
हँसी अकारण खड़े महा वट की छाया में,
वदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,
चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,
गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भर्रायी सीटी स्टीमर की,
खँडहर, ग्रथित अँगुलियाँ, बाँसे का मधु,
डाकिये के पैरों की चाप,
अधजानी बबूल की धूल मिली-सी गन्ध,
झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद,
मसजिद के गुम्बद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे,
झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुँघरू,
सन्थाली झूमुर का लम्बा कसक-भरा आलाप,

रेल का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें
आँधी-पानी,
नदी किनारे की रेती पर बित्ते-भर की छाँह झाड़ की
अंगुल-अंगुल नाप-नाप कर तोड़े तिनकों का समूह,
लू,
मौन।

याद कर सकें अनायास : और न मानें
हम अतीत के शरणार्थी हैं;
स्मरण हमारा-जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन-
हमें न हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के पाप-बोध से।
आओ बैठो : क्षण-भर :
यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर-सेठों की फैया जी से।
हमें मिला है यह अपने जीवन की निधि से ब्याज सरीखा।

आओ बैठो : क्षण-भर तुम्हें निहारूँ
अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूँ
चेहरे की, आँखों की-अन्तर्मन की
और-हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :
तुम्हें निहारूँ,
झिझक न हो कि निरखना दबी वासना की विकृति है!

धीरे-धीरे
धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ-
केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे
हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जावे लिपट झाड़ियों के पैरों में
और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति-रेखा के मसृण ध्वान्त में;
केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध
मुक्ति का,
सीमाहीन खुलेपन का ही।
चलो, उठें अब,
अब तक हम थे बन्धु सैर को आये-
(देखे हैं क्या कभी घास पर लोट-पोट होते सतभैये शोर मचाते?)
और रहे बैठे तो लोग कहेंगे
धुँधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।

-वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जाने :
(जिस के खुले निमन्त्रण के बल जग ने सदा उसे रौंदा है
और वह नहीं बोली),
नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से
जिन की भाषा में अतिशय चिकनाई है साबुन की
किन्तु नहीं है करुणा।
उठो, चलें, प्रिय!

  • इलाहाबाद, 14 अक्टूबर, 1949

समीक्षा: इस कविता में हरि घास कवि के निजता का प्रतीक है। यहाँ कवि ने वर्तमान  का महत्व भी आंका है, जिसका मनुष्य को शहरी व्यस्त जीवन में प्रायः अनुभव नहीं होता। जिसमे से मनुष्य सामजिक बंधनों, शहरी जीवन की यान्त्रिकता और अपनी संस्कारगत वर्जनाओं को भूलकर उस क्षण को सहज और मुक्त मन से प्रकृति के गोद में बिता सके। हरि घास तो हमेशा की तरह आज भी हमें निमंत्रित करती है कि कोई आकर उसे रौंदे। यहाँ हरि घास आधुनिक मन मानव मन की दबी छिपी हुई भावना का प्रतीक है। प्रकृति के बिंबात्मक वर्णन और विरोधाभास द्वारा शहरी यान्त्रिकता और सामाजिक वर्जनाओं की अभिव्यक्ति के द्वारा कविता के विभिन्न घटकों का सार्थक व नाटकीय संयोजन किया गया है। यहाँ शहरी यांत्रिकता पर जो व्यंग्य किया गया है वह कविता को केवल प्रकृति चित्रण की कविता बनाने से बचाता है। यह व्यंग्य कविता को चिन्तनशील कविता का स्वरुप प्रदान करता है।     

1 thought on “‘हरि घास पर क्षण भर’ (कविता) –सच्चितानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (इकाई-5)”

  1. क्या संयोग है। आज ही मैं ने एक कविता हरी दुर्वा पर लिखी है ।

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.