हनुमान चालीसा की रचना

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार ।

बरनौ रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।

बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौ पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहुं कलेश विकार।।

हनुमान चालीसा की रचना हिन्दी साहित्य के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था। तुलसीदास जी के द्वारा रचित हनुमान चालीसा में चमत्कारिक शक्तियों का जिक्र है, जिससे मनुष्य के सभी दुखों का निवारण होता है। पवनपुत्र हनुमान को शिव का रूद्र अवतार माना जाता है। हनुमान जी के जन्मदाता वानर देव राजा केसरी और माता अंजनी  हैं। इसलिए हनुमान जी को अंजनी पुत्र कहकर भी संबोधित किया जाता है। बाल्यावस्था में हनुमान जी ने सूर्य भगवान् को फल समझ कर निगल लिया था। इस कारण संपूर्ण संसार में अन्धकार छा गया था। इस बात से क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने हनुमान जी को तुच्छ वानर समझकर उन्हें अपने वाणों से मूर्छित कर दिया था। जब इंद्रदेव सहित समस्त देवताओं को यह पता चला कि हनुमान जी शिव के रूद्र अवतार हैं तब सभी देवताओं ने उन्हें अपनी शक्तियाँ देकर घायल अंजनी पुत्र हनुमान जी को स्वस्थ्य किया। ऐसा माना जाता है कि समस्त देवताओं ने हनुमान जी को ठीक करने के लिए विशेष मन्त्रों का उच्चारण किया था, जिससे उन्हें सभी देवताओं की शक्ति मिली। कहते हैं कि तुलसीदास जी ने उन्ही मंत्रो के सार से हनुमान चालीसा की रचना की थी जिसमें हनुमान जी के पराक्रम का जिक्र मिलता है।         

हनुमान जी को संकट मोचन क्यों कहा गया है? वे भक्तों के संकट को दूर कर देते हैं। वे सीता राम के आशीर्वाद से ‘अष्टचिरंजिव’ में आते हैं। ऐसी मान्यता है कि उनका जन्म मंगलवार के दिन हुआ था। वैसे तो कई भक्त प्रतिदिन हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड आदि का पाठ करते हैं लेकिन मंगलवार के दिन अधिकांश श्रद्धालु हनुमान चालीसा और सुन्दरकाण्ड का पाठ अवश्य करते हैं।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस महाकाव्य के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण काव्यों की रचना की है। तुलसीदास जी रामानंदी के बैरागी साधू थे। हनुमान चालीसा लिखने के पीछे तुलसीदास जी के साथ हुई एक घटना थी।

1600 ई० का समय था। एक दिन तुलसीदास जी मथुरा जा रह थे। रात अधिक हो जाने के कारण वे आगरा में ही रुक गए। वहाँ के लोगों को पता लगा कि तुलसीदास जी आगरा आए हुए हैं। यह जानकार उनके दर्शन के लिए लोगों का ताँता लग गया। यह बात बादशाह अकबर तक पहुँच गई। अकबर ने बीरबल से पूछा यह तुलसीदास कौन हैं? बीरबल ने अकबर को बताया कि इन्होंने ही रामचारितमानस की रचना की है। तुलसीदास जी रामभक्त हैं। मैं भी इनका दर्शन करके आया हूँ। अकबर भी तुलसीदास जी का दर्शन करने के लिए अपने सिपाहियों को तुलसीदास जी के पास भेजा। तुलसीदास जी को सिपाहियों ने  अकबर का पैगाम सुनाया कि आप लाल किला में हाजिर हों। अकबर आपका दर्शन करना चाहते हैं। सिपाहियों का पैगाम सुनकर तुलसीदास जी ने कहा, मैं भगवान् श्रीराम का भक्त हूँ। मुझे बादशाह और लालकिले से क्या लेना-देना है? यह कहकर उन्होंने लालकिले में जाने से साफ़ इनकार कर दिया। यह बात जब बादशाह तक पहुँची तब वह गुस्से से तिलमिला उठा। उसने अपने सिपाहियों को भेजकर तुलसीदास जी को जंजीरों में जकड़कर लाल किला लाने का आदेश दे दिया। तुलसीदास जी जब लालकिला पहुँचे तब अकबर ने उन्हें कहा, आप करिश्माई व्यक्ति लगते हैं। हमें कोई करिश्मा करके दिखाइए। तुलसीदास जी ने कहा, मैं कोई करिश्मा नहीं करता हूँ। मैं तो श्रीराम का भक्त हूँ। मैं कोई जादूगर नहीं हूँ जो आपको करिश्मा करके दिखाऊं। तुलसीदास जी की यह बात सुनकर अकबर आगबबुला हो गया। उसने सैनिकों को आदेश दिया कि तुलसीदास को जंजीरों से जकड़कर काल कोठरी में डाल दिया जाए। अकबर के आदेशानुसार सैनिकों ने तुलसीदास जी को कालकोठरी में डाल दिया। वे रामनाम जपते-जपते कारागार में चले गए। वहीं कारागार में उन्होंने हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार चालीस दिन तक पाठ करते रहे। चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। आगरा के इस लालकिले पर हजारों बंदरों ने एक साथ हमला कर दिया। अचानक हुए बंदरों के इस हमले से सभी अचंभित हो गए। इस हमले में लालकिला को काफी क्षति पहुँची थी। लालकिले में त्राहिमाम मच गया तब अकबर ने बीरबल को बुलाकर पूछा, बीरबल यह क्या हो रहा है? इतने बन्दर कहाँ से आ गए? बीरबल ने कहा, हुजूर आप तुलसीदास जी से करिश्मा देखना चाते थे, तो देखिये यह करिश्मा। अकबर बीरबल के कहने का मतलब समझ गया। उसे भक्ति की शक्ति समझ में आ गई। उसने तुलसीदास जी से क्षमा मांगकर तुरंत सैनिकों से तुलसीदास जी को कालकोठरी से निकालने का आदेश दिया। उसने तुलसीदास जी से क्षमा मांगकर आदर सहित विदा किया। इस तरह तुलसीदास जी ने मानव को कष्ट से छुटकारा पाने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिखाया है जिस पर चलकर हम मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं। दुनिया उम्मीद पर टिकी है। विश्वास आपको अपने आप पर होना चाहिए।

पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप।।

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