विद्यापति की पदावली (संपादक- डॉ नरेन्द्र झा) पद सं 1-25 तक : इकाई – 5

 

  • विद्यापति का जन्म मधुबनी (बिहार) के बिपसी गाँव में हुआ था।
  • इनका जन्म 14वीं -15वीं शदी के मध्य माना जाता है।
  • कुछ विद्वानों के अनुसार- जन्मकाल (1350-1450) माना जाता है।
  • इनके पितामह जयदत्त संत थे। वे योगेश्वर नाम से विख्यात थे।  
  • गुरु का नाम – पंडित हरि मिश्र था।
  • पत्नी का नाम- चंदादेवी (चंपती) देवी था।   
  • ये तिरहुत के राजा शिवसिंह और कीर्ति सिंह के दरबारी कवि थे।
  • राजा शिवसिंह ने विद्यापति को ‘विपसी’ गाँव दान में दिया था। राजा शिवसिंह ने विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ की उपाधि से विभूषित किया था।   
  • वे ‘शैव’ सम्प्रदाय के कवि थे।

कीर्तिलता के महत्वपूर्ण तथ्य:

  • हरप्रसाद शास्त्री ने नेपाल के राजकीय पुस्तकालय से ‘कीर्तिलता’ की खोज की थी।
  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘कीर्तिलता’ की भाषा को ‘पूर्वी अपभ्रंश’ या ‘टकसाली अपभ्रंश’ की संज्ञा दी है।
  • कीर्तिलता विद्यापति की ऐतिहासिक रचना है। इनके प्रिय कवि जयदेव और प्रिय ग्रंथ जयदेव का ‘गीत गोविंद’ था। “माधव सुन-सुन वचन हमार।”
  • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कीर्तिलता को ‘भृंग-भृंगी संवाद’ माना है।
  • विद्यापति को आदिकाल और भक्तिकाल का ‘संधि कवि’ कहा जा सकता है।
  • कीर्तिलता में विद्यापति के आश्रयदाता राजाकीर्ति सिंह की वीरता और उदारता आदि गुणों का वर्णन मिलता है।
  • विद्यापति ने कीर्तिलता में स्वयं को राजा कीर्तिसिंह का ‘लेखन कवि’ बतलाया है।
  • डॉ हरप्रसाद शास्त्री ने विद्यापति को ‘पंचदेवोपासक’ माना है।
  • डॉ बच्चन सिंह के अनुसार विद्यापति को भक्तकवि कहना उतना ही मुश्किल है जितना खजुराहो के मंदिरों को आध्यात्मिक कहना।
  • विद्यापति को भक्त मानने वाले विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी, चैतन्य महाप्रभु तथा  श्यामसुंदर दास हैं।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विद्यापति को श्रृंगारी कवि मानते हुए पदावली संदर्भ में लिखा है- “अध्यात्मिकता रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं।”
  • अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔंध’ ने उनके काव्य की प्रशंसा करते हुए कहा है की- “गीत गोविंद के रचनाकार जयदेव की मधुर पदावली पढ़कर जैसा अनुभव होता है, वैसा ही विद्यापति की पदावली पढ़कर।”
  • डॉ श्यामसुंदर दास के अनुसार हिन्दी के वैष्णव साहित्य के प्रथम कवि विद्यापति हैं। उनकी रचनाएँ राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम से ओतप्रोत हैं। 
  • विद्यापति ने कीर्तिलता को कहाणी कहा है- “पुरुष कहाणी हौ कत्थौ जसु पत्थावौ पुत्तु।।”
  • कीर्तिलता ‘देसिल बयना’ (अवहट्ठा) में रचित है।

कीर्तिपताका:

  • इसमें कवि विद्यापती ने बड़े ही चतुरता से महाराजा शिवसिंह का यशोवर्णन किया है।
  • इस ग्रंथ की रचना दोहा और छन्द में है। कहीं-कहीं पर संस्कृत के श्लोकों का भी प्रयोग किया गया है।
  • कीर्तिपताका ग्रंथ की खण्डित प्रति ही उपलब्ध है, जिसमे बीच के 9 से 29 तक के पृष्ठ अप्राप्य है।
  • इस ग्रंथ के प्रारंभ में अर्धनारीश्वर, चंद्रचूड़ शिव और गणेश की वंदना है।
  • कीर्तिपताका ग्रंथ के 30 वें पृष्ठ से अंत तक शिवसिंह के युद्ध पराक्रम का वर्णन है।
  • डॉ वीरेंद्र श्रीवास्तव लिखते हैं कि- “अतः निर्विवाद रूप से पिछले अंश को विद्यापति-विरचित कीर्तिपताका कहा जा सकता है।” 

रचनाएँ:

  • विद्यापति संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, मैथिली, ब्रजबुलि, बांग्ला और हिन्दी के पंडित थे।
  • उनकी निम्न चौदह रचनाएँ मिलती हैं- कीर्तिलता, कीर्तिपताका, गया पत्तलक गंगावाक्यावली, दान वक्यावाली, दुर्गाभक्ति तरंगिणी, पुरुष परीक्षा, प्रमाण भूव पुराण संग्रह, पदावली, भूपरिक्रमा, लिखनावली, विभव सागर, वर्ष कृत्य, शैव सर्वस्वसार।
  • इसमें से कीर्तिलता, कीर्तिपताका अपभ्रंश में है और पदावली हिन्दी (मैथिली ब्रजबुलि) में है। शेष ग्रंथ संस्कृत में है।

विद्यापति की उपाधियाँ इस प्रकार से हैं –

मैथिली कोकिल, अभिनव जयदेव (यह उपाधि राजा शिवसिंह ने दी थी), लेखन कवि, वयः संधि के कवि, दशावधान, कवि कंठहार।

पद संख्या: 1  

नन्दक नन्दन कदम्बक तरु-तर धीरे-धीरे मुरली बजाव।

समय संकेत निकेतन बइसल, बेरि बेरि बोली पठाब।।

सामरि तोरा लागि, अनुखन विकल मुरारि।। 

जमुनाक तिर उपवन उद्वेगल, फिरि फिरि ततहि निहारि।

गोरस बेचत अवइत जाइत, जनि जनि पुछ बनमारि

तो हे मतिमान, सुमति! मधुसुदन बचन सुनह किछु मोरा

भनइ विद्यापति सुन वरजौरित वन्दह नन्द-किसोरा ।।1।।

पद संख्या: 2

राधा की वंदना

देख-देख राधा रूप अपार।

अपुरूब के बिहि आनि मिला ओल, खिति-तल लावनि-सार।।

अंगहि अंग-अनंग मुरछायत, हेरए पडए अथीर।

मनमथ कोटि-मंथन करू जे जन, से हेरि महि-मधि गीर।।

कत कत लखिमी चरन-तल ने ओछाए, रंगिनी हेरि विभोरि।

करू अभिलाख मनहि पद पंकज, अहोनिसि कोर अगोरि ।।2।।

पद संख्या: 3

वयः संधि

सैसव जौवन दुहु मिलि गेल स्त्रवन क दुहु लोचन लेल।

बचन क चातुरि लहु-लहु हांस, धरनिये चाँद कएल परगास।।

मुकुर लई अव करई सिंगार, सखि पूछइ कइसे सूरत-विहार।।

निरजन उजर हेरई कत बेरि, हसइ से ऊपन पयोधर हेरि।।

पहिल बदरि-सम पुन नवरंग, दिन-दिन अनंग अगोरल अंग।।

माधव पेखल अपुरूप बाला, सैसव जौवन दुहु एक भेल।

विद्यापति कह तुहु अंगे आनि दुहु एक जोग हक के कह संयानि।।3।।

पद संख्या: 4

पहिलें बदरि कुच पुन नवरंग, दिन दिन बाढए पिडए अनंग।।

से पुन भए गेल बीज कपोर, अब कुज बाढल सिरिफल जोर।।

माधव पेखल रमनि संधान, धाटहि भेटल करत सिनान।।

तनसुक सुबसन हिरदय लागि, जे पुरुष देखल तेकर भागि।।

उर हिल्लोलित चाँचर केस, चामर झाँपल कनल-महेस।।

भनई विद्यापति सुनह मुरारि सुपुरुख बिलसए से बरनारी।।4।।

पद संख्या: 5

खने-खन नयन कोज अनुसरई, खने खन बसन धूलि तनु भरई।।

खने खन दसन-छठा छुट हास, खने खन अधर भागे गहु वास।।

चउकि चलए खने खन चलु मंद, मनमथ-पाठ पहिल अनुबंध।।

हिरदय-मुकुल हेरि हेरि थोर, खने आँचर दए खने भोर।।

बाला सैसव तारुण भेट, लखए न परिअ जेठ कनेठ।।

विद्यापति कह सुन वर कान, तरुनिम सैसव चिन्हइ न जान।।5।।

पद संख्या: 6

कि आरे! नव जौबन अभिराम।

जत देखत तत कहए न पारिअ, छवो अनुपम एक ठामा।।

हरिन इंदु अरविन्द करिनि हेम, पिक बूझल अनुमानी।।

नयन बदन परिमल गति तन रूचि, ओं अति सुललित बानी।।

कुच जुम परसि चिकुर फुजि परसल, ता अरुझाथल हारा।।

जनि सुमेरु उपर मिलि उगल, चाँद बिहुन सब तारा।।

लोल कपोल ललित मनि-कुंडल, अधर बिम्ब अध जाई।।

भौंह भ्रमर, नासापुट सुंदर से देखि फिर लनाई।।

मनइ विद्यापति से बर नागरि, आन न पराए कोई।।

कंसदलन नारयन सुंदर, तसु रंगिनी पए होई।।

आहे-हे अहा! कि-कैसा।।6।।

पद संख्या: 7

माधव, की कहब सुन्दरि रुपे।

केतेक जतन बिहर आनि समारल देखल नयन सरूपे।।

पल्लव-राज चरन-जुग सोभित गति गजराज क भाने।

कनक-कदलि पर सिंह समारल तापर मेरु समाने।।

मेरु उपर दुई कमल फुलायत नाल बिना रूचि पाई।

मनिमय हार धार बहु सुरसरि तओ नहि कमल सुखाई।।

अधर बिम्ब सन, दसन दाडिम बिजु रबि ससि उगथिक पासे।

राहु दूर बस नियरो न आबथि तै नहि करथि गरासे।।

सारंग तसु समधाने।

सारंग ऊपर उगद दस सारंग, केलि करथि मधुपाने।।

भनइ विद्यापति सुन बर जौबति एहन जगत नहि आने।

राजा सिवसिंघ रूप नारायण-लखिमा देई पति भाने।।7।।

पद संख्या: 8

चाँद-सार लए मुख-घटना करू, लोचन चकित चकोर।

अमिय धोय आँचर धनि पूछलि दह दिसि भेल उंजोरे।।

कामिनि कोन गढ़ली।

रूप सरूप मोयं कहि इत असंभव, लोचन लागि रहली।।

गुरु नितम्ब भरे चलए न पारए, माझ-खानि खीनी निमाई।

भाजि जाइत मनसिज धरि राखलि, त्रिबलि लता अरुझाई।।

भनइ विद्यापति अद्भुत कौतुक ई सब बचन सरूपे।

रूपनारायण ई रस जानथि सिवसिंध मिथिला भूपे।।8।।

पद संख्या: 9

जहाँ-जहां पग जुग धरई। तहि-तहि सरोरुह झरई।।

जहां-जहां झलकत अंग। तहि-तहि बिजुरि-तरँग।।

कि हेरल अपरुब गोरी। पैइठल हिय मधि मोरी।।

जहां-जहां नयन बिकास। तहि-तहि कमल-प्रकाश।।

जहां लहु हास-संचार। तहि-तहि अमिय-बिकार।।

जहां-जहां कुटिल कटाख। ततहिं मदन-सर लाख।।

हेरइत से धनि थोर। अब तिन भुवन अगोर।।

पुनु किए दरसन पाब। अब मोहे इत दुःख जाब।।

विद्यापति कह जानि। तुअ गुन देहब आनि।।9।।

पद संख्या: 10

अवनत आनन कए हम रहलिहु, बारल लोचन छोर।

पिया मुख-रूचि पिबय धाओल, जनि से चाँद चकोर।

ततहु सयं हठ हटि मो आनल, धएल चरण राखि।

मधुप मातल उड़ए न पारए, तइअओ पसारए पांखि।

माधव बोलल मधुर बानी, से सुनि मुंदु मोयं कान।

ताहि अबसर ढाम बाम भेल, धरि धनू पंचबाण।

तनु पसेब पासाहनि भासलि, पुलक तइसन जागु।

चूनि-चुनि भए कांचुअ फाटलि, बाहु बालआ भांगु।

भन विद्यापति कम्पित कर हो, बोलल बोल न जाए।

राजा सिंवसिंघ रूपनारायन, साम सुंदर काय।।10।।

पद संख्या: 11

प्रथमीही अलक तिलक लेब साजि। चंचल लोचन काजर आंजि।।

जाएब बसन आंग लेब गोए। दूरहि रहब तें अरथित होए।।

मोरि बोलब सखि रहब लजाए। कुटिल नयन देब मदन जगाए।।

झांपब कुच दरसाओब आध। खन-खन सुदृढ़ करब निबि-बाँध।।

मान करए किछु दरसब भाब। रस रखब ते पुनु पुनु आब।।

हम कि सिखा ओबि अओं रस रंग। अपनहि गुरु भए कहत अनंग।।

भनई विद्यापति ई रस गाब। नागरि कामिनि भाब बुझाव।।11।।

पद संख्या: 12

सुंदरि चललिह पहुघर ना। चहु दिस सखि कर धर ना।।

जाइतहु लागु परम डर ना। जइसे ससि काँप राहु डर ना।।

जाइतहु हार टूटिए गेल ना। भूखल बसन मलिन मेल ना।।

रोए रोए काजर दहाए देल ना। अदकंहि सिंदूर मेटाए देल ना।।

भनई विद्यापति गाओल ना। दुख सहि सहि सुख पाओल ना।।12।।

पद संख्या: 13

बिरह व्याकुल बकुल तरुतर, पेखल नन्द-कुमार से।

नील नीरज नयन सयं सखि, ढरइ नीर अपार रे।।

पेखि मलयज-पंख मृगमद, तामरस घनसार रे।

निज पानि-पल्लव मूंदि लोचन, धरनि पड़ असंभार रे।।

बहइ मंद सुगंद सीतल, मंद माल्या-समीर रे।

जनि प्रलय कालक प्रबल पाबक, दहक सून सरीर रे।।

अधिक बेपथ टूटी पड़ खिति, मस न मुकुता-माल रे।

अनिल तरल तमाम तरुवर, मुंच सुमनस जाल रे।।

मानि-मनि तजि सुदति चलु जहि, सए रसिक सुजान रे।

सुखद स्त्रुति अति सरस दंडक, कवि विद्यापति भान रे।।13।।

पद संख्या: 14

मधु सम बचन कुलिस सम मानस, प्रथमहि जानि न भेल।

अपन चतुरपन पिसुन हाथ देल, गुरुअ गरब दूर गोल।।

सखि हे, मंदप्रेम परिणाम।

बड बए जीवन कएल अपराधिन, नहि उपचर एक ठामा।।

झाँपल कूप देखहि नहि पारल, आरति चललहु धाई।।

तखन लघुगुरु किछु नहि, गुनल अब पछताबक जाई।।

एक दिन उछलहु आन मान हम, अब बुझिल अबगहि।।

अपन मूंड अपने हम चांछल, दोख देब गए काहि।।

भनई विद्यापति सुनु वर जौबति, चित गनब तहि आने।।

पेमक कारन जीउ उपेखिए, जग जन के नहि जाने।।14।।

पद संख्या: 15

माधव, दर्ज्जय मानिनी-मानि।

बिपरित चरित पेखि चकरित भेल, न पूछल आधहु बानि।।

तुअ रूप साम अखर नहि सुनए, तुअ रूप रिपु सम मानि।।

तूअ जन सयं सम्भास न करई, कइसे मिलाइब आनि।।

नील बसन बर, कंचन चुरि कर, पौतिक माल उतारि।।

करि-रद चुरिकर मोति माल बर, पहिरल अरुनिमसारि।।

असित चित्र उर पर छल, मेटल मलयज देह लगाय।।

मृदपद तिलक धोइ दृंगचल, कच सयं मुख लए छपाइ।।

एक तील छल चारु चिबुक पर निंदी मधुफ्सुत सामा।।

तृण-अग्रें करि मलयज रंजल, ताहि छपाओल रामा।।

जलधर देखि चन्द्राताप झाँपल, सामरि सखि नहि पास।

तमाल तरु गन चूना लेपल, सिखि पिक दूरि निबास।।

मधुकर उर धनि चम्पक-तरु तल, लोचन जल भरिपूर।

सामर चिकुर हेरि मुकुर पटकल, टूटि भए गेल सत चूर।।

तुअ गुन-गान कहए सुक पंडित, सुनतहि उठल रोसाइ।।

पिंजर झटकि फटकि पर पटकत, धाए धएल तह जाइ।।

मेरु सम मान सुमेरु कोप सम, देखिभेल रेनु समानी।।

विद्यापति कह राहि मनाएब, आपु सिधारह कान।।15।।

पद संख्या: 16

माघ मास सिरि पंचमी गंजाइली, नवम मास पंचम हरुआई।

अति घन पीड़ा दुख बड पाओल, वनसपति भेलि घाई है।।

सुम खभ बेर सुकुल पक्ख हे, दिनकर उदित-समाई हे।

सोरह सम्पुन बतिस लखन सह, जनम लेल ऋतुराई हे।।

नाचए  जुवतिजना हरखित मन, जनमल बाल मधाई हे।

मधुर महारस मंगल गाएब, मानिनी माँ उड़ाई हे।।

वह मलयानिल ओत उचित हे, नवघन भओं उजियारा।

माधबि फेल भेल मुकुता तुल ते देल बंदनबारा।।

पीअरि पांडरि महुअरि गाएब, काहर कार धतूरा।

नागकेसर-संखि धून पूर, तकर ताल समतूरा।।

मधु लए मधुकर बालक दरहलु, कमल-पंखड़ी लाई।

पओनार तोरि सूत बाँधलि कटि, केसर कएलि बघनाई।।

नव नव पल्लव सेज ओछावल, सिर देल कदम्बक माला।

बैसलि भ्रामरी हरउद गाएब, चक्का चंद निहारा।।

कनक केसुअ सुति-पत्र लिखिए हलु, रासि नछत कए लोला।

कोकिल गनित-गुनित भल जानए, रितु बसंत नाम थोला।।

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बाल बसंत तरुण भए धओल, बढाए सकल संसारा।

दखिन पवन घन अंग उगारए, किसलय कुसुम परागे।

सुललित हार मंजरि घन कज्जल, अखितौ अंजन लागे।।

नव बसंत रितु अगुसर जौबति, विद्यापति कवि गावै।

राजा सिवसिंध रूपनारायण, सकल कला मनभावै।।16।।

पद संख्या: 17

नव वृन्दावन नव नव तरुगन, नव नव विकसित फूल।

नवल बसंत नव मलयानिल, मातल नव अलि कूल।।

विहरई नवल किशोर।

कालिंदी-पुलिन कुंज वन सोभन नव नव प्रेम-विभोर।।

नवल रसाल-मुकुल मधु मातल, नव कोकिल कूल गाय।

नवयुवती गन चित उमता अई, नव रस कानन धाय।।

नव जुबराज नवल बर नागरि, मीलए नव नव भांति।

निति निति एसन नव नव खेलन, विद्यापति मति माति।।17।।

पद संख्या: 18

नाचहु रे तरुनी तजहु लाज। आएल बसंत रितु बनिक राज।।

हस्तिनि, चित्रिन, पदुमिनी नारि। गोरी सामरी एक बूढि बारि।।

बिबिध भांति कएलन्हि सिंगार। पहिरल पटोर गृम झूम हार।।

के ओ अगर चन्दन घसि अर कटोर। ककरहु करपुर खोईदां तमोर।।

कें ओ कुमकुम मरदाब आंग। ककरहु मोतिअ भल छाज मांग।।18।।

पद संख्या: 19

मधुपुर मोहन गेल रे, मोरा विहरत छाती।

गोपी सकल बिसरल रे, जल छल अहिबाती।।

सूतल चलहूँ अपनगृह रे, निंदइ गेलऊँ सपनाई।

करसौ छूटल परसमनि रे, कोन गेल अपनाई।।

कत कहबो कत सुमिरब रे, हम मरिए गरानि।

आनक धन सों धनबंति रे, कुबजा भेल रानि।।

गोकुल चान चकोरल रे, चोरी गेल चंदा।

बिछुडि चललि दुहु जोड़ी रे, जीब दद गेल धंदा।।

काक भाख निज भारवह रे, पहु आओत गोरा।

खीर खांड भोजन देब रे, भरि कनक कटोरा।।

भनइ विद्यापति गाओल रे, धैरज धर नारी।

गोकुल होयत सोहा ओन रे, फेरि मिलत मुरारी।।19।।

पद संख्या: 20

मदन बदन बड पिया मोर, बोलडछ अबहु देहें बरबोधी।।

चौदिस भमर मम कुसुम-कुसुम रम, निरति माँजरि पीवई।।

मेद पवन चल पिक कछु कछु कह, सुनि बिरहिनी कैसे जिबइ।।

सिनेह अछल जल हम भेव न टूटत, बड बोल जत सब थीर।।

अइसन के बोल दहु निज सिम तेजी कहु, उछल यथोनिधि नीर।।

भनइ विद्यापति अरेरे कमलमुखी, गुनगाहक पिया तोए।

राजा सिवसिंघ रूपनारायण, सहजे एको नहिं भारो।।20।।

पद संख्या: 21

सारिन हे हमर दुखद नहि ओर।

ई भर बादर माह भादर, सून मन्दिर भोर।।

झांपि घन गरजन्ति संतत, भुवन भरि वरसंतिया।

कंत पाहुन काम दारुन, सघन खर सर हंतिया।।

कुलिस कत सत पात मुद्रित, मयूर नाचत मातिया।

मत्त दादुर डाक डाहुक फाटि जायत शतिया।।

तिमिर दिग भरि पोरियामिनि, अथिर बुजुरिक वांतिया।

विद्यापति कह कइसे गमाओब, हरि बिना दिन-रातिया।।21।।

पद संख्या: 22

अनुखन माधव माधव सुमरइत, सुंदरि भेल मधाई।

ओ निज भाव सुभावहि विसरल, अपने गुन लुबुधाई।।

माधव अपरूप तोहर सिनेह।

अपने  बिरह अपन तनु जरजर जिबइत भेलि संदेह।।

भोरहि सहचरि कातर दिठि हेरि, छल-छल लोचन पानी।

अनुखन राधा-राधा रटइत, आधा-आधा बानि।।

राधा समं जब पुनतहि माधव, माधव सयं जब राधा।

दारुण प्रेम तबहि नहि टूटत, बाढ़त बिरहक बाधो।।

दुहु दिस दारु-दहन जैसे दगधईम आकुल कीट परान।

ऐसन बल्लभ हेरि सुधा मुखि, कबि विद्यापति भान।।22।।

पद संख्या: 23

नहि करब बर निरमोहिया।

बिता भारी तन, बसत न तिन्हाका, बघछल काँख तर रहिया।।

बन बन फिरषि मसान जगबधि, घर आँगन ऊ बनोलिन कहिया।

सास ससुर नहि ननद जेठौनि जाए बैसत धिया केकरा ठहिआ।।

बूढ बडद उकपाल गोल एक, सम्पति भांगक झोरिया।

भइन विद्यापति सुनु हे मनाइल, शिव सन ढाली जगत के कहिया।।23।।

पद संख्या: 24

माधव, बहुत मिमती कर तोय।

दए तुलसी तिल देह समर्पितु, दया जनि छाड़बि मोय।।

गनइल दोसर गुन लेख न पाओवि, जब तुहूँ करबि विचार।

तुहूँ जगत जगनाथ कहाओसी, जग बाहिर जड छार।।

किए मानुस मसु पास्वि भए जनभिए, अथवा कीट पंतग।

करम-विपाक गतागतपुनु पुनु, मति रह तुअ परसंग।।

भइन विद्यापति अतिसय कातर तरइत इह भव-सिंधु।

तुअ पद पल्लव करि अवलम्बन तिल एक देह दिन बन्धु।।24।।

पद संख्या: 25

तातल सैकत बारि-बिंदु सम, सुत-मित-रमनि-समाज।

तोहे बिसरि मन ताहे समरपिनु, अब मझु हो कोन काज।।

माधव, हम परिणाम निरासा, तुहूँ जगतारण दीन दयामय।

अतय तोहर बिसबास।

आध जनम हम नींद गमायनु, जरा सिसु कत दिल गेला।

निधुबन रमनिरभस रंग मातनु , तोहे भजब कोन बेला।।

कत चतुरानन भरि भरि जाओत, न तुअ आदि अवसाना।

तोहे जनम पुन तोहे समाओत, सागर लहरि समाना।।

भनई विद्यापति सेष समन मय, तुअ बिनु गति नहि आरा। आदि अनादिक नाथ कहाओसी उब, तारन भार तोहारा।।25।।

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