प्राचीन गुरुकुल पद्धति और गुरु-शिष्य परम्परा

भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति की बहुत लंबी परंपरा रही है। शिक्षा से संबंधित प्राचीन भारत का दर्शन किसी एक ग्रंथ में सीमित नहीं है। विद्यार्थी गुरुकुल में विद्या अध्ययन करते थे। तपोस्थली में सभा, सम्मेलन और प्रवचन हुआ करते थे। विशेषज्ञों द्वारा परिषद में शिक्षा दी जाती थी। प्राचीन भारत के गुरुकुलों में ऋषियों ने शिक्षा के विषय में अपनी-अलग परम्पराएँ बनाई थी। इसके बाद भी इन सब में एक तत्व सामान्य था कि सभी गुरु अपने-अपने विद्यार्थियों का सर्वोतमुखी कल्याण चाहते थे।

प्राचीनकाल में धौम्य ऋषि, च्यवन, द्रोणाचार्य, संदीपनी, वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि, गौतम, भारद्वाज आदि ऋषियों के आश्रम प्रसिद्ध थे। बौद्धकाल में बुद्ध, महावीर और शंकराचार्य की परंपरा से जुड़े गुरुकुल भी जग प्रसिद्ध थे। वहाँ विश्व भर से मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करने आते थे। वहाँ गणित, ज्योतिष, खगोल, विज्ञान, भौतिक आदि सभी तरह की शिक्षा दी जाती थी।

प्रत्येक गुरुकुल अपनी विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध था। कोई धनुर्विद्या सिखाने में कुशल था तो कोई वैदिक ज्ञान देने में। कोई अस्त्र-शस्त्र सिखाने में निपुण था तो कोई ज्योतिष और खगोल विज्ञान में दक्ष था। भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में अनौपचारिक और औपचारिक दोनों प्रकार के शैक्षणिक केंद्रों का उल्लेख मिलता है। औपचारिक शिक्षा मंदिर, आश्रमों और गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। उच्च शिक्षा के केन्द्र भी यही थे। जबकि अनौपचारिक शिक्षा परिवार, पुरोहित, त्यौहारों आदि के माध्यम से प्राप्त होती थी। अनेक धर्म सूत्रों में इस बात का उल्लेख है कि माता ही बच्चे की सर्वश्रेष्ठ गुरु है। चरक संहिता (2)

वैदिककाल में परिषद, शाखा, चरण जैसे संघों का स्थापना हो गया था। लेकिन व्यवस्थित शिक्षण संस्थाएँ सार्वजनिक स्तर पर बौद्धों द्वारा प्रारंभ की गई थी। व्यवस्थित शिक्षण संस्थाओं के अंतर्गत प्राचीन भारत की विश्व प्रसिद्ध गुरुकुल शिक्षा पद्धति का उल्लेख है। इन गुरुकुलों में विद्यार्थी महान ऋषियों के सम्पर्क में रहकर विभिन्न विषयों की शिक्षा प्राप्त करते थे। विष्णुपुराण के अनुसार उपनयन संस्कार के पश्चात आचार्य कूल में रहकर विद्यार्थी, विभिन्न विषयों की शिक्षा प्राप्त करते थे। विष्णु पुराण (3/ 10/ 12) गुरुकुल बस्तियों से दूर जंगलों में स्थापित थे। इसलिए इसे तपोवन या आश्रम भी कहा जाता था। कालीदास के साहित्य में गुरुकुलों के मनोरम और मनोहारी स्वरुप का वर्णन मिलता है।

मनुस्मृति में भी गुरुकुलों की महता का वर्णन मिलता है। महाकाव्य में गुरु और शिष्य के मध्य पिता-पुत्र जैसे घनिष्ठ संबंधों का संकेत प्राप्त होता है। महाभारत के आदिपर्व में ‘कण्व’ ऋषि के आश्रम का वर्णन किया गया है। उस समय के आश्रम में विभिन्न प्रकार से अध्यापन के तरीकों की चर्चा मिलती है जिसमें गोष्ठी, परिचर्चा आदि गतिविधियाँ सम्मिलित थीं। गुरुकुल में रहने के आधार पर तीन प्रकार के स्नातक थे- विद्या स्नातक, व्रत स्नातक और विद्या व्रत स्नातक। कुछ ऐसे गुरुकुल थे जहाँ शैक्षणिक गतिविधियाँ उत्कृष्टता के श्रेष्ठ स्तर पर पहुँच गई थी। प्राचीन भारत के साहित्य में ऐसे बहुत से नगरों का उल्लेख मिलता है।

तक्षशिला प्राचीन भारत का अत्यंत प्राचीन शिक्षण केन्द्र था। बौद्ध साहित्य में इसका अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है। महाभारत में उल्लेख है कि उपमन्यु, आरुनी और वेद व्यास ने यहीं से शिक्षा ग्रहण किये थे। काशी प्राचीन भारत का अत्यंत प्रशिक्षित शैक्षणिक नगर था। प्राचीन शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत प्रारंभिक स्तर पर वैदिक मन्त्रों के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा का मुख्य विषय वेद था। शैक्षणिकसत्र की अवधि छह मास का होता था जो वर्षा ऋतु से शुरू होकर बसंत ऋतु के आगमन तक रहता था।

मनुस्मृति का मत था कि तत्व ज्ञान की प्राप्ति चार माध्यमों से की जा सकती है। शिक्षण के द्वारा, अपनी बुद्धि के द्वारा, मित्रों और सहपाठियों के द्वारा तथा अनुभव से।

प्राचीन भारत की प्रमुख शिक्षण पद्धतियों को इस प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है –मौखिक या कंठस्थ पद्धति, प्रश्नोत्तर पद्धति, शास्त्रार्थ पद्धति, प्रत्यक्षीकरण पद्धति और अन्य पद्धतियाँ भी थी। प्राचीनकाल में लिपि की जानकारी नहीं होने के कारण शिक्षा मौखिक ही दी जाती थी। इस पद्धति के द्वारा पाठ को पुनः दोहराने के लिए आवृति और पुनरावृति पद्धति का प्रचलन प्रारंभ हो गया। इस पद्धति के प्रभाव से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति तीव्र हो गई। स्मरण की सुविधा के लिए पाठों को काव्य के रूप में लिखा जाने लगा। इसी के बाद सूत्रपद्धति का विकास प्रारंभ हुआ।

ऋग्वेद में साहित्यिक वाद-विवाद पद्धति का उल्लेख मिलता है। इस प्रतियोगिता में जो विद्यार्थी विजयी होता था उसे पुरुस्कृत किया जाता था। इस वाद-विवाद का उद्देश्य जय-पराजय नहीं होकर शंकाओं का निवारण होता था। कनिष्ठ विद्यार्थी को अभ्यास कराने के लिए वरिष्ठ विद्यार्थी की सहायता लिया जाता था। ऐसे विद्यार्थीयों को व्रिहद्तर ब्रहमचारी कहा जाता था। ब्राहमण ग्रन्थ में उल्लेख है कि सुबह पंक्षियों के कलरव के पूर्व ही वेद पाठ का आरम्भ हो जाता था। उच्चारण शुद्ध करना आवश्यक होता था। अशुद्ध उच्चारण करने पर सजा का भी प्रावधान था। मंत्रो का अर्थ जानने के बाद ही उच्चारण करने पर बल दिया जाता था। शिक्षाविदों का मत था कि बिना अर्थ जाने केवल रटने से ज्ञानवृद्धि नहीं होता है।

शस्त्र विद्या के अंतर्गत अध्यापान की पद्धति के रूप में धनुर्वेदीय उपनयन का भी उल्लेख मिलता है। इसके अंतर्गत किसी शुभ दिन में विद्यार्थियों को व्रत रखना पड़ता था, उसके बाद निर्धारित नियम के अनुसार उसे शस्त्र दिया जाता था। ब्राह्मण को धनुष, क्षत्रिय को खड़ग, वैश्य को भाला, और शुद्र को गदा दिया जाता था। आर्युवेद के विद्यार्थियों को अग्नि को साक्षी मानकर अध्यापन कराने की परम्परा थी। प्रारंभ में तरबूजा, खीरा लौकी आदि पर शल्य चिकित्सा सिखाया जाता था। इसके पश्चात पशुओं के शवों पर धमनियों को छेदने की कला सिखाई जाती थी। सुश्रुत मानते थे कि सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान से पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। इसलिए वे अपने शिष्यों को मृत शरीर का छेदन कर व्यावहारिक ज्ञान देते थे। इसप्रकार प्राचीन भारत के आचार्यों ने शिक्षा को केवल सैद्धान्तिक नहीं बनाकर उसे व्यावहारिक बनाने का पूर्ण प्रयास किया था। गुरुकुल में केवल ज्ञान देना ही आवश्यक नहीं था। यह भी देखा जाता था कि वास्तव में विद्यार्थीयों ने उनसे कुछ सीखा है या नहीं। इसके लिए विद्यार्थियों की परीक्षा ली जाती थी।

प्राचीनभारत के विश्वविद्यालयों में नालंदा विशेष उल्लेखनीय था। नालंदा विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम समाप्ति के बाद परीक्षा का उल्लेख नहीं मिलता है। एक मात्र मिथिला विश्वविद्यालय ही ऐसा विश्वविद्यालय था जहाँ अंतिम परीक्षा होती थी। इसे ‘शलाका परीक्षा’ कहा जाता था। परीक्षा उतीर्ण करने के बाद प्रमाण-पत्र मिलने का उल्लेख नहीं मिलता है। प्राचीन समय में समाज के लिए यह निंदनीय माना जाता था कि विद्यार्थी धन के अभाव में शिक्षा से वंचित रह जाए। यदि कोई शिक्षा के लिए धन का दान नहीं देता था तो उसे पाप समझा जाता था। प्रत्येक गृहस्त का धर्म था कि वह आगंतुक विद्यार्थी को भिक्षा दे। योग्य और विद्वान विद्यार्थियों को राजा की ओर से छात्रवृति दिया जाने का भी उल्लेख मिलता है।

प्राचीनभारत में स्त्री शिक्षा के विषय में अनेक विचार मिलते हैं।  ऋग्वैदिक काल में अनेक विदुषी स्त्रियों की जानकारी प्राप्त होती है जिन्होंने मन्त्रों की रचना की थी। ये विदुषियां अनेक सभाओं में भी भाग लेती थी। इनमे रोमशा, अपाला, लोपामुद्रा, घोषा, निवावरी, कक्षीवती आदि का उल्लेख है। ऋग्वेद (8/91/40) यह स्पष्ट है कि वैदिककाल में स्त्रियों को वेद का अध्ययन और यज्ञ संबंधी अधिकार प्राप्त था। व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें अनेक प्रकार की शिक्षाएँ प्रदान की जाती थी, जिनका उपयोग वे अपने पिता के कार्य में सहयोग करने के लिए करती थी। ऋग्वेद (8/91/ 5-6) यदि किसी कारणवश वैदिक शिक्षा प्राप्त करने में महिला असफल हो जाती थी तब वे विभिन्न प्रकार के व्यावहारिक विषयों, शिल्पों, गृह उपयोगी विषयों, ललित कलाओं, सैनिक शिक्षा आदि में विशेषज्ञ होती थी। तैत्रिरीय संहिता (5/7) (6/1) (6/5) तथा मैत्रायन संहिता (3/73) गुरुकुलों में दो प्रकार की छात्राएँ थीं- साघोवधू और ब्रम्ह्वादिनी। साघोवधू वे महिलायें थी जो विवाह के पूर्व ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए गृहस्त जीवन में प्रवेश करती थी। ब्रम्ह्वादिनी वे महिलाए थीं जो ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से आजीवन अविवाहित रहकर ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करती थी। महाकाव्य काल में स्त्री शिक्षा के स्वरुप में परिवर्तन आया और वे व्यवहारिक शिक्षा की ओर अधिक ध्यान देने लगी। भीष्म ने कहा है कि स्त्रियों को पूज्य मनना चाहिए, क्योंकि जिस घर में स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता का निवास करते है। महाभारत अनुशासन पर्व (40/46/5) उत्तरा ने अर्जुन से शिक्षा प्राप्त किया था। महाभारत (39) कुन्ती अथर्ववेद की विद्वान् थी। महाभारत (3/305) पतंजलि के द्वारा लिखित महाभाष्य में वर्णन मिलता है कि जो स्त्रियाँ काशकृत्स्न द्वारा लिखित मीमांसा शास्त्र का अध्ययन करती थी, उन्हें इसी नाम से जाना जाता था। महाभाष्य (4/1/14) बौद्धकाल में स्त्रियों की वैदिक शिक्षा पर धीरे-धीरे प्रतिबन्ध लगना शुरू हो गया। मनु स्मृति (2/67) बाद में स्मृतिकारों ने स्त्रियों के उपनयन संस्कार का भी विरोध कर दिया। मनु स्मृति (2/56) इससे यह स्पष्ट होता है कि समय-समय पर स्त्री शिक्षा के मापदंड बदलते रहते हैं। साघोवधुओं में गार्गी, मैत्रयी, लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, निवावरी, आत्रेयी, प्रतिथेयी, बढ़वा, कुंती, कौशल्या, तारा, सीता आदि के नाम उल्लेखनीय है, जबकि ब्रम्ह्वादिनी स्त्रियों में वेदवती, बृहस्पति की बहन भुवना, अपर्णा, पाटला सतरूपा आदि का नाम आता है। ब्रम्ह्वादिनी स्त्रियों का झुकाव उच्च शिक्षा के साथ-साथ अध्यात्म की ओर भी होता था।

वैदिक युग में शिष्य बनने के लिए जाति संबंधी कोई भी बंधन नहीं था। योग्यता, विनम्रता और ग्रहणशीलता के आधार पर शिष्य बनाया जाता था। यदि विद्वान व्यक्ति क्षत्रिय होता था तो ब्राम्हण भी उसका शिष्य बन सकता था। उपनिषद में वर्णन मिलता है कि सत्यकाम जाबाल ब्राम्हण नहीं होते हुए भी विद्वान था और उसके गुरुकुल में अनेक विद्यार्थी अध्ययन करते थे। छान्दोग्य उपनिषद (4/10/14) तथा बृहदारण्यक उपनिषद (6/3/12) ऐसे भी अनेक ऋषियों का उल्लेख मिलता है जो जन्म से ब्राम्हण नहीं थे लेकिन उन्होंने अपने ज्ञान के कारण ब्रम्हऋषि पद प्राप्त किया था। ऐसे विद्वानों में वाल्मीकि, वेदव्यास विश्वामित्र कण्व, पराशर, भारद्वाज आदि का नाम उल्लेख है।

सूत्रकाल तक शुद्र विद्यार्थी भी ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे और उनका समावर्तन संस्कार भी होता था। अश्रलायन गृहसूत्र (3/8)  बुद्ध के अनेक शिष्य जन्म से शुद्र थे। हरिकेशबल का जन्म चाण्डाल जाती में हुआ था लेकिन उन्हें उनके ज्ञान के कारण ऋषि माना जाता था। वर्ण के आधार पर द्विज वर्ण के छात्रों को वर्णी कहा जाता था। अष्टध्यायी (5/2/134) प्राचीन काल में शिक्षा सभी के लिए खुली थी। बाद में परिस्थितियाँ परिवर्तित हुई और वैदिक शिक्षा कुछ वर्णों तक ही सीमित होकर रह गई। विद्वान ब्राम्हणों को वैदिककाल में राजकीय संरक्षण और आश्रय मिलता था। उन्हें प्रचुर दक्षिणा मिलती थी। शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक विद्वान शासन की ओर से नियुक्त किये जाते थे। महाभारत अनुशासन पर्व (69)

   महाकाव्यों के युग में यज्ञमंडप भी शिक्षा के साधन थे। इस यज्ञ भूमि को विभिन्न भागों में विभाजित किया जाता था। आश्रमों से आए हुए ऋषि-मुनियों का निवास स्थान ऋषि संवाद कहलाता था। इस स्थान पर विभिन्न शास्त्रीय चर्चाएँ होती थी जिससे ज्ञान का प्रचार-प्रसार होता था। रावलपिंडी के निकट स्थित तक्षशिला में सर्पयज्ञ में शुकदेव ने महाभारत की कथा सुनाई थी। महाभारत के प्रारंभ में ही नैमिषारण्य का उल्लेख मिलता है जहाँ शौनक नामक कुलपति बारह वर्षीय यज्ञ कर रहे थे। महाभारत के आदिपर्व (1/1) आचार्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अपने शिष्यों के साथ देशाटन करते थे जिससे शिष्य तो ज्ञान प्राप्त करते थे साथ में समाज को भी ज्ञान की प्राप्ति होती थी।   

हमारे धर्म ग्रन्थों और ऐतिहासिक प्रमाणिक अवशेषों के आधार पर उपलब्ध प्रमाणों में कई आचार्यों और उनके आश्रमों का उल्लेख मिलता है जो प्राचीन गुरुकुल पद्धति और गुरु-शिष्य परम्परा का सुनियोजित पध्दति के ऊपर बल डालता है। यहाँ कुछ प्रमुख ऋषियों और उनके आश्रम (गुरुकुल) तथा गुरु शिष्य परम्परा का उपलब्ध प्रमाण देने का प्रयास कर रही हूँ।

1. वाल्मीकि आश्रम: वाल्मीकि की प्रसिद्धि आदिकवि के रूप में थी। त्रेताकाल में वाल्मीकि ने ही ‘रामायण’ लिखी थी। वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि ने श्लोक संख्या 7/93/16, 7/96/18 और 7/1111/11 में लिखा है कि वे प्रचेता के पुत्र हैं। मनुस्मृति में प्रचेता को वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है। प्रचेता का एक नाम वरुण भी है। महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। तमसा नदी के तट पर व्याध द्वारा क्रोंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डालने पर वाल्मीकि के मुंह से व्याध के लिए शाप के जो उद्गार निकले, वे लौकिक छंद में एक श्लोक के रूप में थे।

सीताजी ने अपने वनवास का अंतिम काल इनके आश्रम पर व्यतीत किया था। वहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मीकि आदिवासियों और वनवासियों के गुरु थे। इनका आश्रम वर्तमान के तुरतुरिया स्थान पर था। तुरतुरिया जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ से लगभग 150 किमी दूर वारंगा की पहाड़ियों के बीच बहने वाली बालमदेई नदी के किनारे पर स्थित है। यह सिरपुर से 15 मील घने वन प्रदेश में स्थित है। यहीं पर मातागढ़ में एक स्थान पर वाल्मीकि आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में जानकी कुटिया है।

2. विश्वामित्र का आश्रम:  राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त किए थे। विश्वामित्र गायत्री के बहुत बड़े उपासक थे। माना जाता है कि महर्षि विश्वामित्र का आश्रम बक्सर (बिहार) में स्थित था। इस स्थान को गंगा-सरयू संगम के निकट बताया गया है। विश्वामित्र के आश्रम को ‘सिद्धाश्रम’ भी कहा गया है।

हालांकि यदि हम उनकी तपोभूमि की बात करें तो वह हरिद्वार में थी, जहां आज शांति निकेतन बना है। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। विश्वामित्रजी उन्हीं गाधि के पुत्र थे।

विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं। माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज है, उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ट होकर एक अलग ही स्वर्गलोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्रीमंत्र की रचना किया था। 

3. ऋषि वशिष्ठ : ऋषि वशिष्ठ राजा दशरथ के कुलगुरु थे। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था।

4. भारद्वाज मुनि: वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। इनका आश्रम प्रयाग में था। ये विमान शास्त्र में प्रवीण थे। इसके अलावा यहां वैदिक ज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। 

ऋषि भारद्वाज के 10 पुत्र थे। सभी पुत्र ऋग्वेद के मंत्रदृष्टा माने गए हैं। उनकी 2 पुत्रियां भी थीं जिसमें से एक का नाम ‘रात्रि’ था, वे रात्रि सूक्त रचयिता थीं। दूसरी का नाम कशिपा था। भारद्वाज के 10 पुत्रों के नाम हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र।

ऋषि भारद्वाज व्याकरण, धर्मशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद और भौतिक विज्ञानशास्त्र आदि अनेक विषयों में पारंगत थे। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने इंद्र से व्याकरण और आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण कर आयुर्वेद संहिता लिखी। महाभारत के अनुसार भारद्वाज ने महर्षि भृगु से धर्मशास्त्र की शिक्षा ग्रहण कर ‘भारद्वाज-स्मृति’ की रचना की। 

ऋषि भारद्वाज ने ‘यंत्र-सर्वस्व’ नामक वृहद ग्रंथ की रचना की थी। इस ग्रंथ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘विमानशास्त्र’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रंथ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

5. गुरु धौम्य: गुरु धौम्य का आश्रम सेवा, तितिक्षा (सरदी-गरमी दुःख आदि सहन करने की शक्ति) और संयम के लिए प्रख्यात था। ये अपने शिष्यों को सुयोग्य बनाने के लिए उनको तप व योग साधना में लगाते थे। स्वयं गुरु महर्षि धौम्य की तपःशक्ति आशीर्वाद से शिष्य को शास्त्रज्ञ बनाने में समर्थ थी। आरुणि, उपमन्यु और वेद (उत्तंक)- ये 3 शास्त्रकार ऋषि महर्षि धौम्य के शिष्य थे। 

6. कपिल मुनि : राजा सगर के 60 हजार पुत्र अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है। यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया। ध्यानमग्न कपिल मुनि ने क्रोध में आकर जैसे ही अपनी आंखें खोली, राजा सगर के 60 हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए।

बुद्ध के जन्मस्थान ‘कपिलवस्तु’ कपिल के नाम पर बसा नगर था। सगर के पुत्र ने सागर के किनारे कपिल को देखा। बाद में वहीं गंगा का सागर के साथ संगम हुआ। इससे मालूम होता है कि कपिल का जन्मस्थान संभवत: कपिलवस्तु और तपस्या क्षेत्र गंगासागर था। कपिल मुनि ‘सांख्य दर्शन’ के प्रवर्तक थे। इनकी माता का नाम देवहुती व पिता का नाम कर्दम था। कपिल ने माता को जो ज्ञान दिया, वही ‘सांख्य दर्शन’ कहलाया।

7. कण्व : कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

103 सूक्त वाले ऋग्वेद के 8वें मंडल के अधिकांश मंत्र महर्षि कण्व तथा उनके वंशजों तथा गोत्रजों द्वारा दृष्ट हैं। कुछ सूक्तों के अन्य भी द्रष्ट ऋषि हैं, किंतु ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’ के अनुसार महर्षि कण्व अष्टम मंडल के द्रष्टा ऋषि कहे गए हैं। इनमें लौकिक ज्ञान-विज्ञान तथा अनिष्ट-निवारण संबंधी उपयोगी मंत्र हैं।

महाभारत के आदिपर्व में वर्णित है कि कण्व ऋषि के आश्रम में अनेक नैयायिक रहा करते थे, जो न्याय तत्वों के कार्यकारणभाव, कथा संबंधी स्थापना, आक्षेप और सिद्धांत आदि के ज्ञाता थे। न्याय दर्शन के रचयिता महर्षि गौतम थे। सोनभद्र में जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर की दूरी पर कैमूर श्रृंखला के शीर्ष स्थल पर स्थित कण्व ऋषि की तपस्थली है, जो कंडाकोट नाम से जानी जाती है। 

8. अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मंडल के दृष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिंधु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ।

अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दंपति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा, महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

9. गौतम ऋषि का आश्रम : गौतम ऋषि न्याय दर्शन के प्रवर्तक थे। देवी अहिल्या उनकी पत्नी थी। इंद्र ने छलपूर्वक अहिल्या का अपमान करने का प्रयास किया था जिसके चलते गौतम ऋषि ने अहिल्या को पत्थर बन जाने का शाप दे दिया था। राम के चरण स्पर्श से अहिल्या शापमुक्त होकर पुनः मानवी बन गईं।

एक प्रमाण में गौतम ऋषि का आश्रम बिहार के सारण जिला में छपरा से लगभग 15 किलोमीटर पश्चिम में मिलता है। यहाँ आज भी एक विशाल मन्दिर है जिसका नाम ‘गौतमस्थान’ है। यहाँ के रेलवे स्टेशन का नाम भी उन्हीं के नाम पर ‘गौतमस्थान’ रखा गया है।

महर्षि गौतम बाण विद्या में अत्यंत निपुण थे। न्यायशास्त्र के अतिरिक्त स्मृतिकार भी थे तथा उनका धनुर्वेद पर भी कोई ग्रंथ था, ऐसा विद्वानों का मत है। उनके पुत्र शतानंद निमि कुल के आचार्य थे। त्तदृष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

10. भरत मुनि द्वारा रचित भरतनाट्यम शास्त्र सामवेद से प्रेरित है। हजारों वर्ष पूर्व लिखे गए सामवेद में संगीत और वाद्य यंत्रों की संपूर्ण जानकारी मिलती है।

11. शौनक : शौनक ने 10 हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया था।

12. परशुराम: एक बार गणेशजी ने परशुराम को शिव-दर्शन से रोक दिया तो रुष्ट परशुराम ने उन पर परशु का प्रहार कर दिया जिससे गणेशजी का एक दांत नष्ट हो गया और वे एकदंत कहलाए। प्रारंभ में परशुराम का आश्रम नर्मदा नदी के तट पर स्थित था। बाद में वे अगत्स्य मुनि की तरह दक्षिण प्रदेश चले गए थे, जहां ‍उन्होंने नया आश्रम स्थापित कर शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा दी। एक बार श्रीकृष्ण उनसे दक्षिण के इसी आश्रम में मिलने गए थे। उन्होंने सीता स्वयंवर में श्रीराम का अभिनंदन किया। कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन किया। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी।

13. वेदव्यास : महर्षि वेदव्यासजी का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने महाभारत सहित सैकड़ों ग्रंथों की रचना की जिनमें से 4 पुराण भी थे। 

कृष्ण द्वैपायन वेदव्यासजी ने ब्रह्मा की प्रेरणा से 4 शिष्यों को 4 वेद पढ़ाए-

* मुनि पैल को ऋग्वेद

* वैशंपायन को यजुर्वेद

* जैमिनी को सामवेद तथा

* सुमंतु को अथर्ववेद पढ़ाया।

उक्त 4 शिष्यों ने दुनियाभर में अपने-अपने आश्रम खोलकर वेदों की शिक्षा दी। इस तरह वैदिक ज्ञान का व्यापक पैमाने पर प्रचार-प्रसार हुआ और संपूर्ण धरती फिर से वेदमय बन गई थी।

14. सांदीपनि ऋषि: सांदीपनि ऋषि का आश्रम मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर स्थित ‍‍शिप्रा नदी के किनारे तपोभूमि के रूप में प्रतिष्ठित था। प्राचीनकाल में यह आश्रम जगप्रसिद्ध था तथा यहां से उच्च कोटि के शिष्य, गुरु से विद्या सीखकर गए। जिनमें प्रमुख हैं- कृष्ण, बलराम और सुदामा। आज भी सांदीपनि ऋषि के आश्रम के अवशेष पाए जाते हैं।

15. गुरु द्रोणचार्य: गुरु द्रोणचार्य का आश्रम हस्तिनापुर में था। उन्होंने हजारों शिष्यों को शिक्षा दी। उन शिष्यों में पांडु पुत्र पांडव का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। गुरु द्रोण युद्ध से जुड़ी सभी तरह की शिक्षा देने में पारंगत थे। घुड़सवारी, धनुर्विद्या और अन्य हस्त और दिव्यास्त्रों की शिक्षा का यह प्रमुख आश्रम था। यहाँ ज्योतिष, चिकित्सा और वैदिक ज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। 

द्रोणाचार्य भारद्वाज मुनि के पुत्र थे। ये संसार के श्रेष्ठ धनुर्धर थे। द्रोण का जन्म उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में बताया जाता है जिसे हम देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहते थे। द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ जिनसे उन्हें अश्वत्थामा नामक पुत्र मिला।

इन आचार्यों के अलावा अगस्त्य, कश्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन और ऐतरेय के भी गुरुकुल थे।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.