महुआ (लेख)

पेड़-पौधे हम सभी जीव-जंतुओं के लिए प्रकृति के तरफ से दिया गया अनमोल उपहार है। इसके बिना हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। यह हमें जीवनदायनी वायु ऑक्सीजन से हमारा भरण-पोषण भी करती हैं। हम यह सब जानते हुए भी अपने सुख के लिए इन्हें उजाड़ रहे हैं। अर्थात हम जिस डाली पर बैठे हैं उसे ही काट रहे हैं। प्रकृति ने हमें ऐसे-ऐसे पेड़-पौधे दिए हैं जिसका उपयोग खाने के साथ-साथ कई रोगों में दवा के लिए भी होता है। सम्भव है कि नई पीढ़ी उनके विषय में बहुत कुछ नहीं जाते हों। हमारी नई पीढ़ी शायद महुआ के विषय में कम जानते हों किन्तु आज से चालीस पैतालीस वर्ष पहले हमने महुआ का भरपूर उपयोग किया है। विज्ञान में महुआ को मधुआ लोंगिफोलिया (Madhuca Longifolia) नाम से जाना जाता है। पश्चिमी देशों में इसे ‘बटरनट ट्री’ के नाम से जाना जाता है। महुआ का वृक्ष पूरे भारत में मुख्य रूप से मध्य भारत, गुजरात, देश के पश्चिमी भाग, पूर्वोतर सीमा से छोटानागपुर तक यह एक पर्णपाती वृक्ष के रूप में समुद्रतल से 1200 मीटर ऊँचाई तक पाया जाता है। महुआ भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है। यह भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में पाया जाने वाला वृक्ष है। यह पादपों के ‘सपोटेसी परिवार’ से संबंध रखता है। इसकी बहुत सारी प्रजातियाँ पाई जाती है। दक्षिण भारत में इसकी लगभग बारह प्रजातियाँ पाई जाती है। जिनमे ऋषिकेश, अश्विनकेश, जटायुपुष्प प्रमुख है।

महुआ को सूर्य का प्रकाश अधिक प्रिय है अतः यह छाया में नहीं पनपता है। महुआ को अनेक नामों से जाना जाता है। इसका संस्कृत में मधूक, मराठी में मोहरा, गुजराती में महुडी, बंगाली में महुया, अंग्रेजी में बटर ट्री, लैटिन में मधूका इंडिका आदि नाम है। इसके फल, फूल, बीज, लकड़ी आदि सभी चीजें काम में लायी जाती है। सबसे अधिक खास बात यह है कि यह पेड़ सैकड़ों वर्षों तक फलता-फूलता रहता है।

फागुन-चैत के महीने में इसकी सभी पत्तियाँ झड़ जाती हैं। नई कोपलों के फूटने से पहले डालियाँ फूलों से लदने लगता है। इसके बाद फूल जब पूर्ण यौवन पर होते हैं तब इसमें से मदमस्त करने वाली मीठी-मीठी सुगंध चारों तरफ वातावरण में पसरने लगता है। इसकी इतनी मदमाती महक होती है कि आस-पास रहने वाले साभी जीव-जंतुओं को अपनी तरफ आकर्षित कर मदहोश कर देता है। महुए का फूल बहुत ही रसीला और मीठा होता है। इनके रसों को चूसने के लिए किट-पतंगों में भी होड़ लग जाती है। इसके फूल ‘फोटोट्रॉपिक’ होते हैं अथार्त सूर्य की रौशनी में ही खिलते हैं। सूर्योदय होते ही इसके फूल एक-एक कर टपकने लगते हैं। दोपहर तक इनका टपकना तकरीबन बंद हो जाता है। यह क्रम महीनों तक चलता रहता है। जमीन पर टपक कर बिखरे हुए महुआ के फूलों का नजारा ऐसा दिखता है मानों सफेद मोती के गलीचे बिछे हो। कीट-पतंगे न केवल इन फूलों से अपनी भूख मिटाते हैं बल्कि बदले में ये पतंगें परागन जैसा महत्वपूर्ण कार्य भी करते हैं। यह प्रकृति के अजीब निराले कार्य हैं।

 महुआ भारत के जनजातिय समुदाय का महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थ है। आयुर्वेद के अनुसार महुआ के पेड़ में मौजूद कई औषधिय गुण है जो असंख्य बीमारियों के इलाज करने में सहायक हैं। महुआ के छाल का इस्तेमाल क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, डायबिटीज आदि में किया जाता है। महुआ के पत्तियों का प्रयोग गठिया, बावासीर, दस्त, बुखार, सुजन आदि के लिए बहुत ही असरदार होता है। महुआ के फूल के रस का प्रयोग कई तरह के त्वचा रोग के लिए किया जाता है। महुआ गुणकारी और धातुवर्द्धक होता है। इसका फूल प्रकृति में नम, शीतल और शुष्क, गर्म वात-पित्त शामक, नाड़ी बल प्रदायक, शक्तिप्रद, मादक आदि गुणों से परिपूर्ण होता है। फूलों के साथ-साथ’ इसके पेड़ के छाल, बीज का तेल आदि तीनों भाग  का प्रयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता है।

महुआ से कई प्रकार के भोज्य पदार्थ भी बनाया जाता है। जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। महुआ को आटा में मिलाकर ‘महुअर’ (पूरी) बनाते हैं। महुआ को भुनकर उसमे ‘बर्रे’ एक तरह का तेलहन (अनाज) होता है जिसे मिलाकर ओखली में कूटकर बनाया जाता है। उसे ‘लाटा’ कहते है। महुआ में तीसी मिलाकर भी लाटा बानाया जाता है। महुआ से कई तरह के पेय पदार्थ भी नाबाया जाता है इसका तेल भी बहुत ही फायदेमंद होता है।  

 महुआ से संबंधित एक पौराणिक लोककथा बहुत ही प्रचलित है। किसी गाँव में एक मुखिया जी रहते थे। वे अपने अतिथियों का बहुत ही आदर सत्कार किया करते थे। ताकि अतिथि उनके द्वार से बहुत खुश होकर जाएँ। कई अतिथि उनके घर आये और गए किन्तु कोई भी उनके घर में खाए भोजन की तारीफ़ उस तरह से खुश होकर नहीं करता था जिस तरह से मुखिया जी चाहते थे। प्रतिदिन मुखिया जंगल में घूमने के लिए जाते थे और अतिथियों के लिए अच्छे-अच्छे फल-कंदमूल लेकर आते थे। जिससे कि वे अतिथियों का स्वागत कर सके। मुखिया जी का बेटा भी अपने पिता की तरह ही अतिथि सत्कार करने में माहिर था।

एक दिन उनके घर में एक ऐसे मेहमान आये जो पहले भी उनके यहाँ आ चुके थे। दोनों बाप-बेटा मिलकर फल और कंदमूल से मेहमान का अच्छी तरह से आदर सत्कार किये। मेहमान बड़े प्रेम से खुश होकर खा रहे थे। खाते-खाते उन्होंने पूछा, क्या इस जंगल में एक ही तरह का फल-कंदमूल मिलता है। हमारे यहाँ के जंगल में तो विभिन्न प्रकार के फल मिलते है। मेहमान के बात को सुनकर मुखिया का बेटा मुखिया की तरफ देखने लगा। मुखिया जी बोले हम तो जंगल में हमेशा घूमते रहते हैं कि कुछ नया किस्म का फल मिले लेकिन यहाँ सिर्फ यही मिलता है। अतिथि बोले- “चाहे जो भी हो मुझे तो आपके द्वारा किया गया अतिथि सत्कार सबसे बेहतर लगता है। इतने आदर-भाव से तो कोई भी भोजन नहीं कराता है।” अतिथि की बात सुनकर मुखिया को अच्छा लगा किन्तु खुशी नहीं हुई। दूसरे दिन मुखिया जी का बेटा जंगल में कुछ नया ढूंढने के लिए निकला। कुछ समय के बाद जंगल में घूमते-घूमते वह बहुत थक गया। एक पेड़ के नीचे बैठकर वह आराम करने लगा। तभी उसने देखा कि महुआ के पेड़ के नीचे गड्ढा का पानी पीकर चिड़ियाँ बहुत ही फुदक-फुदक कर चहचहा रही थी और खेल रही थी। उसने देखा कि सभी चिड़ियाँ बहुत ही खुश थी। उसने सोचा इस पानी में कुछ है। उसने देखा कि पानी में महुआ के फल-फूल गिरा हुआ है’ जिसे पीकर सभी चिड़ियाँ खुश हैं। मुखिया का बेटा उस गड्ढ़े का पानी निकालकर पी लिया। पानी पीने के बाद वह भी खुशी होकर झूमने लगा। उसने महुआ का ढेर सारा फल इकठ्ठा करके घर ले आया। उस दिन मुखिया के घर तीन मेहमान आये हुए थे। मुखिया अतिथियों को बहुत प्यार से खिला रहा था और बार-बार अपनी पत्नी की ओर देख भी रहा था। उस दिन अतिथि झूमते हुए खुश होकर गए। अब जो भी अतिथि आते मुखिया वही पानी पीला देते थे। अतिथि खुश होकर झूमते हुए जाते थे। अब मुखिया बहुत खुश होते थे। महुआ बहुपयोगी और आय का स्त्रोत का साधन है। वर्तमान में इसकी स्थिति ठीक नहीं हैं। आज से चालीस वर्ष पहले ये बहुतायत मात्र में पाया जाता था। अब बढ़ते शहरीकरण तथा वन क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण होने से इसकी संख्या कम होती जा रही है। डर इस बात की है कि लगातार पेड़ों की कटाई से कहीं ये प्रजाति समाप्त न हो जाए। शहरी लोग भले ही इस पेड़ के बारे में अनभिज्ञ हो लेकिन ग्रामीण लोगों के लिए यह कमाई का बहुत ही उपयोगी साधन है। आदिवासी और कुछ लोग इसे देववृक्ष जान कर इसकी पूजा भी करते हैं।

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