पलाश के फूल

पलाश ‘फबासी’ परिवार का एक फूल है, जिसका वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिया मोनोस्पर्मा’ है। इस फूल को इसके आकर्षक सुर्ख लाल रंग के कारण इसे ‘जंगल का आग’ भी कहा जाता है। पलाश का यह फूल उत्तर प्रदेश का ‘राज्य पुष्प’ है। इस पुष्प को ‘भारतीय डाकतार विभाग’ के द्वारा डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित किया जा चुका है। प्राचीन समय में होली खेलने के लिए पलाश के फूल से रंग और अबीर तैयार किया जाता था। भारत में इसे कई नामों से जाना जाता है। जैसे- पलाश, याज्ञिक, टेसू, केसू, ढाक, किंशुक, ब्रह्मावृक्ष, त्रिपत्रक, करक, पर्ण, आदि। इसके फूल बहुत ही सुंदर और आकर्षक सुर्ख लाल रंग के होते हैं। पलाश बसंत ऋतु में खिलता है। कहा जाता है कि ऋतुराज बसंत का आगमन पलाश के बिना पूर्ण नहीं होता है, अथार्त पलाश के बिना बसंत का श्रृंगार पूर्ण नहीं होता है। यह भारत के सभी क्षेत्रों और सभी स्थानों में पाया जाता है। इसके पत्तों के एक डंठल में तीन पत्ते होते है। शायद इसी कारण ‘ढाक के तीन पात’ वाली कहावत लोक जीवन में मशहूर हुई होगी। यह तीन रंगों में होता है- सफेद, पीला और नारंगी-लाल रंग। लाल फूल वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिया मोनोस्पर्मा’ है। सफेद पुष्पों वाले लता पलाश को औषधिय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेज में दोनों प्रकार के पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद पलाश का वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा’ है और लाल पलाश को ‘ब्यूटिया सुपरबा’ कहा जाता है। आर्युवेद में पलाश के पेड़ को अहम् स्थान दिया गया है। इसे कई तरह के बीमारियों के लिए औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

वैदिक काल में पलाश का प्रमुख उपयोग यज्ञकार्यों के लिए किया जाता था। ऋग्वेद में सोम, अश्वस्थ तथा पलाश वृक्षों की विशेष महिमा वर्णित है। कहा जाता है कि पलाश के वृक्ष में सृष्टि के प्रमुख देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास है। आर्युवेद में पलाश के अनेक गुण बताये गए हैं। इसके पाँचों अंगों तना, जड़, फल, फूल और बीज से दवाएँ बनाने  की विधियाँ दिया गया है।

19 वीं शदी के प्रारम्भ में इन पेड़ों की तेजी से कटाई होने के कारण अब ये कहीं-कहीं दिखाई देते है। पलाश का वृक्ष ‘लाख’ उत्पादन करने के लिए एक अच्छा संसाधन है। ग्रामीण इलाकों में इसकी जानकारी लोगों को दी जाए तो यह आय का अच्छा स्त्रोत बन सकता है। पलाश के फूलों से अच्छी गुणवत्ता का रंग तैयार किया जा सकता है। होली का एक प्रसिद्ध गीत है- “बजारे से रंग जिन ले अइब पिया, हम टेसू से खेलब होरी हो।”

टेसू के फूलों से बने रंगों से होली खेलने पर हमारे त्वचा की रक्षा होती है। पलाश मौसम के संधि काल में होता है। इस समय कई तरह की बीमारियाँ हमला करती हैं। इन सभी मौसमी बीमारियों से पलाश का रंग हमारे शरीर और त्वचा की रक्षा करता है। इससे लघु उद्द्योग को बढ़ावा मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसका फूल तोड़े जाने के बाद बहुत दिनों तक रखा जा सकता है।

आम आदमी से लेकर साधू-संतों और सन्यासियों तक को सम्मोहित करने वाला यह पलाश का वृक्ष आज संकट में है। वैज्ञानिकों के द्वारा यह चेतावनी दिया गया है कि अगर इसी तरह पलाश के वृक्षों का विनाश होता रहेगा तो ‘ढाक के तीन पात’ वाली कहावत सिर्फ कहावत भर ही रह जाएगी। यह पलास एक दो दिनों में ही संकट में नहीं आया है। पिछले तीस चालीस वर्षों में दोना-पत्तल बनाने वाले कारखानों के बढ़ने, गाँव में चकबंदी होने तथा वन माफियाओं के द्वारा अँधाधुंध कटाव के कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में पलाश के वन घटकर दस प्रतिशत से भी कम बच गए हैं।

एक समय बंगाल के पलाशी का मैदान तथा अरावली की पर्वत मालाएँ पलाश के फूलों के लिए दुनियाँ में मशहूर थीं। विदेशों से लोग पालाश के इस रक्तिम वर्ण के फूल को देखने के लिए आते थे।

महाकवि पद्माकर ने अपने छन्द में इसकी महिमा का बखान करते हुए लिखा है-

 “कहैं पद्माकर परागन में, पौन हूँ में, पानन में पिक में, पलासन पंगत है।”

ब्रज, अवधी, बुन्देलखंडी, राजस्थानी आदि के लोकगीतों में भी पलाश के गुण गाए गए है। कबीर दास जी ने भी एक जगह पर कहा है-

“कबीर गर्व न कीजिए, इस जोबन की आस।

टेसू फुला दिवस दस, खंखर भय पलास”।।

कबीर दास जी ने पलाश की तुलना एक नवयुवक से किया है जो अपनी जवानी के में  अपनी आकर्षण पर गर्व करके लेटा है किन्तु वह बुढापे में अकेला रह जाता है अथार्त पलाश वृक्ष की शोभा बसंत में सिर्फ चार महीने के लिए ही होता है। बाकी के आठ महीने यह झाड़-झंखाड़ ही रहता है।

सेनापति के शब्दों में-

“लाल लाल टेसू, फूली रहे हैं बिसाल संग,

स्याम रंग भेंटी मानौं मसि मैं मिलाए हैं”

पलाश के अनेक औषधीय गुण हैं: जोड़ों का दर्द, खुनी बवासीर, अंडकोष की सुजन, रक्त एवं पित्त विकार, गोंद, आँखों के रोग, मिर्गी, घेंघा रोग, नकसीर, हाथी पाँव रोग फलेरिया, पेट के कीड़ें, दस्त, सुजन आदि कई रोगों का इलाज संभव है। पलाश को पवित्र माना गया है। इसकी लकड़ी का उपयोग हवन के लिए किया जाता है। इसलिए इसे ‘’याज्ञिक’ कहते है

पलाश के वनों को देखने का मन हो तो कभी बसंत ऋतु में झारखंड के गाँव में अवश्य आये। शहर में नहीं गाँवों की तरफ। कुछ दिनों के  लिए वहीं के होकर रह जायेंगे।  

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