जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी महाकाव्य’ (कविता)

‘कामायनी’ हिन्दी भाषा का एक ‘महाकाव्य’ और जयशंकर प्रसाद की अमर कृति है। यह आधुनिक छायावादी युग की सर्वोतम प्रतिनिधि काव्य है। इसे छायावाद का ‘उपनिषद’ भी कहा जाता है। यह प्रसाद जी की अंतिम काव्यकृति है। यह महाकाव्य 1936 में प्रकाशित हुई थी। इसकी भाषा साहित्यिक खड़ी बोली और छंद तोटक है। इसमें पंद्रह सर्ग चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, इर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य और आनन्द हैं। ‘चिंता’ सर्ग से लेकर ‘आनन्द’ सर्ग तक की यात्रा करता हुआ यह काव्य हिमगिरी की एक चेतनता से समरस होने वाले मनु के जीवन का इतिहास है। कामायनी का चिंता सर्ग 1927 के ‘सुधा’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। ‘कामायनी’ पर प्रसाद जी को मंगलाप्रसाद पुरस्कार मिला। ‘कामगोत्र’ में जन्म लेने के कारण श्रद्धा को ‘कामायनी’ कहा गया। प्रसाद जी ने कामायनी में आदि मानव की कथा के साथ युगीन समस्याओं पर प्रकाश डाला है। कामायनी का अंगीरस श्रृगांर और शांत रस तथा शैली प्रतीकात्मक है। कामायनी के कथा का आधार ऋग्वेद, छन्दोग्य, उपनिषद, शतपथ ब्राह्मण तथा भागवत हैं। घटनाओं का आधार शतपथ ब्राह्मण से लिया गया है। कामायनी की पूर्वपीठिका प्रेमपथिक है। कामायनी की श्रद्धा का पूर्व संस्करण ‘उर्वर्शी’ है। कामायनी का हृदय लज्जा है। कामायनी की कथा के चार सोपान हैं- जलप्लावन और मनु, मनु श्रद्धा मिलन और गृहस्त जीवन, मनु इड़ा मिलन और सारस्वत नगर की घटना और मनु का कैलाश यात्रा।

डॉ द्वारिका प्रसाद के शब्दों में- “प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक ही नहीं हैं, अपितु उसकी प्रौढ़ता, शालीनता, गुरुता, गंभीरता के भी पोषक कवि हैं। प्रसाद की कविताओं में प्रकृति के सचेतन रूप के साथ-साथ मानव के लौकिक एवं पारलौकिक जीवन की जैसी रमणीक झाँकी अंकित है, वैसी किसी अन्य कवि की कविता में दृष्टिगोचर नहीं होती।”

इस महाकाव्य के नामकरण के संदर्भ में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने लिखा है- “कामायनी या श्रद्धा का चरित्र अपनी आदर्शात्मक विशेषता के कारण काव्य का सर्वप्रमुख चरित्र है। कामायनी को नायिका प्रधान काव्य कहा जा सकता है।”

डॉ शभुनाथ के सिंह शब्दों में- “कामायनी में मनुष्य को न तो देवता बनाने का प्रयत्न किया गया है और न उसे भयंकर राक्षस, निरे पशु या नियातिचालित प्राणी के रूप में ही उपस्थित किया गया है। इसके विपरीत उसके सभी चरित्र नीचे से ऊपर उठते हुए मनिमय कोश से आनंदमय कोश की ओर अग्रसर होते हुए अंत में पूर्णता की प्राप्ति करते हुए दिखलाए गए हैं।”

डॉ भोलानाथ तिवारी के शब्दों में- “अंतर्द्वंद्व की दृष्टि से मनु का चित्रण पुरे हिन्दी काव्य में अकेला है।”

डॉ भोलानाथ तिवारी के शब्दों में- ‘कामायनी के चरित्र दोहरे हैं। उनके दोहरेपन की रक्षा करते हुए भी कवि ने उन्हें पूर्ण सजीव रखने में जो सफलता पाई है वह निश्चय ही अप्रतिम है।’

डॉ भोलानाथ तिवारी के शब्दों में- ‘भारतीय नारी के जिस उदात्ततम रूप और विशाल अंतःकरण का कवि प्रसाद की कल्पना स्पर्श कर सकी उसी का मोहक चित्र ‘कामायनी’ (श्रद्धा) है।’

अमरकोष के अनुसार- ‘गौ भू वाच्स्तिवड़ा इड़ा’ कहकर इड़ा शब्द पृथ्वी अथार्त बुद्धि, वाणी आदि का पर्यायवाची माना गया है।  

कामायनी के आमुख में ही प्रसाद जी ने कहा है- ‘मन्वन्तर के अर्थात मानवता के युग के प्रवर्तक के रूप में मनु की कथा आर्यों की अनुश्रुति में दृढ़ता से मानी गई है। इसलिए वैवस्वत मनु को ऐतिहासिक पुरुष मानना उचित है।’

कामायनी के विषय में साहित्यकारों के कथन:

डॉ नागेन्द्र: कामायनी मानव चेतना का महाकाव्य है। यह आर्ष ग्रंथ है।

मुक्तिबोध: कामायनी फैंटसी है।

इन्द्रनाथ मदान: कामायनी एक असफल कृति है

नन्ददुलारे वाजपेयी: कामायनी नये युग का प्रतिनिधि काव्य है।

सुमित्रानंदन पंत: कामायनी ताजमहल के सामान है।

नागेन्द्र: कामायनी एक रूपक है।

श्यामनारायण: कामायनी विश्व साहित्य का आठवाँ महाकाव्य है।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’: कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है।

डॉ नगेन्द्र: कामायनी समग्रतः में समासोक्ति का विधान लक्षित करती है।

नामवर सिंह: कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है।

हरदेव बाहरी: कामायनी आधुनिक हिन्दी साहित्य का सर्वोतम महाकाव्य है।

रामरतन भटनागर: कामायनी मधुरस से सिक्त महाकाव्य है।

विश्वंभर मानव: कामायनी विराट सामंजस्य की सनातन गाथा है।

हजारी प्रसाद दिवेदी: कामायनी वर्तमान हिन्दी कविता में दुर्बल कृति है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल: कामायनी में प्रसाद ने मानवता का रागात्मक इतिहास प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार निराला ने तुलसीदास के मानस विकास का बड़ा दिव्य और विशाल रंगीन चित्र खिंचा है।

शांतिप्रिय द्ज्वेदी: कामायनी छायावाद का उपनिषद है।

रामस्वरूप चतुर्वेदी: कामायनी को कम्पोजिसन की संज्ञा देने वाले

बच्चन सिंह: मुक्तिबोध का कामायनी संबंधिअध्ययन फूहड़ मार्क्सवाद का नमूना है।

मुक्तिबोध: कामायनी जीवन की पुनर्रचना है।

नगेन्द्र: कामायनी मनोविज्ञान की ट्रीटाइज है।

डॉ कमलेश्वर प्रसाद सिंह: ‘मनु और श्रद्धा एक पुनर्मिलन प्रप्त्याशा है’

रामस्वरूप चतुर्वेदी: कामायनी आधुनिक समीक्षक और रचनाकार दोनों के लिए परीक्षा स्थल है।

कामायनी की ऐतिहासिकता में यत्र तत्र वर्तमान के स्वर मुखरित हुए हैं। कवि ने स्वयं लिखा है- “मनु भारतीय इतिहास के आदि पुरुष हैं। राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज है। हाँ कामायनी की कथा श्रृंखला मिलाने के लिए ही थोड़ा बहुत कल्पना को भी ले आने का आधार मैं नहीं छोड़ा हूँ।”   

मानव सभ्यता की शुरुआत, उत्थान और विकास अनेक घटनाओं, परिवर्तनों और रहस्यों से भरा हुआ है। विकास यात्रा की इस महागाथा में मानव के साथ प्रकृति भी एक अनिवार्य तत्व के रूप में हमेशा से विद्यमान रही है। जिस प्रकार प्रकृति अपने सुंदर वातावरण रूपी आँगन में प्राणियों को आश्रय और जीवन देती है उसी प्रकार उसका भरण-पोषण भी करती है। इन सबके बावजूद प्रकृति का भी अपना कुछ नियम होता है। इसलिए शोषित या उपेक्षित किए जाने पर प्रकृति अपने विनाशक और विकराल रूप से प्राणियों को दंडित भी करती है।

विश्व के सभी प्राचीन सभ्यताओं में यह प्रचलित है कि जब-जब मानव ने स्वयं को सर्वशक्तिमान समझकर प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ किया है, तब-तब प्रकृति ने मुसलाधार वर्षा, आंधी-तूफान और भूकंप के द्वारा सब कुछ तबाह किया है। ‘प्रलय’ भारतीय शास्त्रों और पुराणों के अनुसार उस घटना को कहते हैं जो कि एक निश्चित समय पर घटती है, जिसमें सृष्टि का अंत हो जाता है। चारों तरफ केवल पानी ही पानी नजर आता है। जलप्लावन की घटना विश्व के इतिहास में एक प्राचीन घटना है। शतपथ ब्राह्मण में इसे ‘ओध’ पुरानों में प्रलय कहा गया है। प्रलय के तीन प्रकारों की बात कही गई है- नैमित्तक, प्राकृतिक और आत्यान्तिक। कामायनी में वर्णित प्रलय को ब्राह्म नैमित्तक कहा गया है। पिछले जल प्रलय का वर्णन प्राचीन ग्रंथों ‘ओध’ नाम से किया गया है। मुस्लिम ग्रंथों के अनुसार इसे ‘क़यामत’ और अंग्रेजी में ‘Doom’s Day’ कहते हैं। पहलवीं ग्रंथों तथा पारसी के धार्मिक ग्रंथ ‘बेंदीदार’ में जलप्लावन का वर्णन हुआ है। सुमेरियन ग्रंथ, यूनान, बेबिलोनिया के साहित्य में भी जलप्लावन की घटना वर्णित है। इस प्रकार यह कथा संसार के सभी साहित्यों में वर्णित है।    

ऐसी मान्यता है कि मानवों के उदय से पहले धरती पर देवजाति का साम्राज्य था। अपार समृधि और एश्वर्य के कारण वे भोग-विलास में डूब गए थे। अहंकार में चूर उन्होंने प्रकृति को भी अपने अधीन समझ लिया था। उनके नियमों में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया था। जिसके फलस्वरूप प्रकृति ने अपने भयंनक रूप में जल-प्रलय के द्वारा उन्हें दंडित किया। इस जल-प्लावन में मनु को छोड़कर समस्त देवजाति नष्ट हो गई थी।

पौराणिक भारतीय आख्यानों में मनु को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उन्हें मानव सभ्यता का आदिपुरुष माना जाता है। मनु के जीवन को समझने के लिए पहले हमें भारतीय समय के गणना से संबंधित कुछ तथ्यों को समझना होगा। पौराणिक भारतीय ग्रंथों में सृष्टि के इतिहास को ‘कल्पों’ (कल्प हिंदू समय चक्र की बहुत लम्बी मापन इकाई है) में बाँटा गया है। एक कल्प 4 अरब 32 करोड़ मानव वर्षों के बराबर माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि प्रत्येक कल्प के अंत में प्रलय के द्वारा सृष्टि का विनाश हो जाता है। इसी आधार पर सृष्टि में मानव जाति की उत्पति और विकास का इतिहास ‘मन्वंतरों’ तथा ‘युगों’ में विभाजित किया गया है। संसार का निर्माण करने वाले परमशक्ति की कल्पना ‘ब्रह्मा’ के रूप में की गई है। जिस प्रकार साधारण मानव की आयु सौ वर्ष मानी गई है’ उसी तरह ब्रह्मा की आयु भी सौ वर्ष मानी गई है, किन्तु दोनों प्रकार के गणनाओं में बहुत अंतर होता है। ब्रह्मा का एक दिन ‘कल्प’ कहलाता है। उसके बाद प्रलय होता है। प्रलय ब्रह्मा जी की एक रात है, जिसके बाद फिर नई सृष्टि होती है। चारों युगों के एक चक्कर को चतुर्युगी कहते हैं। 1,000 चतुर्युगी का एक ‘कल्प’ होता है। ब्रह्मा के एक मास में 30 कल्प होते हैं। प्रत्येक कल्प को 14 भागों में बाँटा गया है। इन भागों को ‘मन्वन्तर’ कहते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर का एक मनु होता है, जिन्हें ब्रह्मा के द्वारा सृजित किया जाता है। सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिए चारो युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग को मिलाकर एक ‘महायुग’ माना जाता है। 71 महायुग मिलकर एक मन्वन्तर होता है। महायुग की अवधि 43 लाख 20 हजार वर्ष मानी गई है।

प्राचीन गणनाओं के अनुसार वर्तमान ‘वराह’ अथवा ‘श्वेतवराह’ कल्प चल रहा है। जिसमे 14 मन्वंतरों में से 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं। अभी सातवां मन्वन्तर चल रहा है। इस मन्वन्तर के 28 वीं चतुर्युगी के तीन युग बीत चुके हैं। अभी चौथा युग अथार्त कलयुग चल रहा है। कलयुग का समय 4 लाख 32 हजार वर्षों का माना गया है। वर्तमान वर्ष यानी सनˎ 2019 अथवा विक्रमी संवत् 2076 में कलयुग का 5121वां वर्ष चल रहा है। प्रत्येक मन्वन्तर में एक मनु का शासन होता है। कामायनी के नायक मनु वराहकल्प के सातवें मन्वन्तर के मनु है, वर्तमान मनु का नाम ‘वैवस्वत’ अथवा ‘श्रद्धादेव’ है। इनसे पहले 6 मनु हो चुके हैं। जिनके नाम इसप्रकार हैं स्वयंभुव मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, रेवात मनु, चाक्षुसी मनु, और सातवां वैवस्वत मनु या श्रद्धादेव मनु जो अभी चल रहा है।                

कामायनी मनु और श्रद्धा, पुरुष और नारी की और उसके मनोंभावों के विकाश की कथा है।      कामायनी के कथा को पौराणिक और ऐतिहासिक आधार लेकर लिखी गई है। कामायनी का कथानक इसी खंड-प्रलय के बाद परिस्थितियों से संबंधित है। जिसके अनुसार प्रलय के बाद वैवस्वत मनु, कामायनी या श्रद्धा के साथ मिलकर मानव सभ्यता की रचना करते हैं। मनु कामायनी के प्रमुख पात्र हैं, जो जल-प्रलय के बाद जीवित बचे हैं। श्रद्धा भी उस प्रलय में बच गई है। श्रद्धा कामगोत्र की कन्या है। इसलिए उनका नाम कामायनी है। इड़ा एक और प्रमुख पात्र है जो सारस्वत प्रदेश की रानी है। मनु और श्रद्धा का पुत्र मानव है। इसके आलावा असुर पुरोहित किलात और आकुली गौण पात्र है। कथा का आरम्भ विशाल जल-प्लावन की घटना के साथ हुआ।

चिंता-सर्ग- मनु भारतीय इतिहास के आदि पुरुष हैं। वे देवजाति के शक्तिशाली पुरुष भी माने जाते हैं। जल-प्रलय में देव जाति का सम्पूर्ण विनाश हो जाता है। देवताओं में केवल मनु ही अकेले जीवित बचते हैं।

  देवताओं  की सारमयी तथा विलासमयी  भूमि नष्ट हुई,

  वह उन्मत्त विलास हुआ क्या! स्वप्न रहा या छलना थी

  देव  सृष्टि की सुख-विभावरी  ताराओं  की  कलना थी।

  विकल  वासना के प्रतिनिधि  वे सब मुरझाये चले गए।

   आह!  जले अपनी  ज्वाला से फिर वे जल में गले, गए।

जल-प्लावन की समाप्ति के बाद मनु का मन चिंतित था। वे हिमालय की सबसे ऊँची चोटी पर बैठकर प्रलय-प्रवाह देख रहे थे। उनकी नौका पास ही एक वट वृक्ष के साथ बंधी थी। जिसे महामतस्य ने एक ही झटके में यहाँ पहुँचा दिया था। उनके चारों तरफ जल ही जल है।

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह

एक  पुरुष भींगे  नयनों से देख  रहा था  प्रलय  प्रवाह।

चिंता  कातर  वदन  हो रहा  पौरुष  जिसमे  ओत-प्रोत

उधर उपेक्षामय  यौवन  का बहता  भीतर मधुमय स्त्रोत।

इस विनाश को देखकर मनु का हृदय द्रवित हो रहा था। वे अपने अतीत को याद करते हैं। मनु विचार करने लगते हैं कि जिन देवताओं के चरणों में समस्त संसार का वैभव था। जिनका जीवन आमोद-प्रमोद से व्यतीत हो रहा था। वे देवता भी काल की भ्रू-भंगिमा से पलभर में नष्ट गए थे। देव संस्कृति के दूसरा विनाश का कारण था निरीह पशुओं का यज्ञों में बलि देना। जिसके कारण समस्त प्राकृतिक शक्तियाँ उन देवताओं के विरुद्ध थी। जल-प्लावन का कारण देवताओं का अहंकार अतिशय विलास भावना थी। इस महाविनाश में मनु ही बच गए थे। मनु चिंतित और अधीर हो रहे थे। वे एक नौका में बैठकर सागर की लहरों के साथ डूबते उतराते चले जा रहे थे तभी एक बड़ी मछली ने उनके नौका पर प्रहार किया। उस मछली के प्रहार से उनकी नौका हिमालय की शिखर पर अटक गई। मनु बच जाते हैं। वे एक ऊँची शिलापर बैठकर इस भयावह जल-प्लावन को देखते हैं और मन ही मन विचार करने लगते हैं। उसी समय उनके मन में विचार आया कि यह जीवन क्षणभंगुर है, मिथ्या है? मृत्यु ही सत्य है। कुछ समय के बाद प्रलय की रात समाप्त हो गई। धीरे-धीरे प्रकृति का प्रकोप भी शांत होने लगा। मनु ने देखा कि प्रलय की रात समाप्त हो रही थी और एक आशा की किरण जाग रही थी। उदयमान ग्रह, नक्षत्रों को देखकर मनु के मन में जिज्ञासा जागी और उन्हें लगा कि इसके पीछे कोई अज्ञात शक्ति है जो गहन अन्धकार, रात्रि के स्थान पर प्रभात की सुनहरी किरने दिखाने लगी। यही आशा थी।

वाष्प बना उड़ता जाता था या वह भीषण जल-संघान,

सौरचक्र में आवर्तन  था प्रलय  निशा का होता प्रात।

आशा सर्ग-  जल-प्लावन के बाद प्रकृति एक नया रूप धारण करती है। उषा की बेला के वर्णन के साथ आशा का आरम्भ होता है। हिम पिघलने लगता है। वनस्पति नया स्वरूप धारण करती है। स्वच्छ और शुद्ध वायु प्रवाहित होने लगता है। आकाश में नये-नये रंग बिखरने लगते है। प्रसाद ने प्रकृति का भव्य वर्णन किया है-

उषा  सुनहरे तीर  बरसती जय-लक्ष्मी सी उदित हुई,

उधर अपराजित कालरात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई।

सिंधुसेज  पर  धरावधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी,

प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐंठी-सी।

मनु को इस बात का एहसास होने लगता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ‘शक्ति’ और ‘सौंदर्य’ का मूल है। प्रकृति के इस बदलाव ने मनु के जीवन में आशा का संचार भर दिया था। वे भविष्य में आने वाले सुख के सपने देखने लगते हैं। उनमे आशा की ज्योति प्रज्वलित होने के कारण जीने की लालसा भी बढ़ गई थी। वे एक सुंदर गुहा में अपना निवास स्थान बनाते हैं। भोजन बनाने के लिए वे धान चुनते हैं और जो कुछ बच जाता है उसे वे वहीं  प्रलय में पीड़ित अपरिचित प्राणी के लिए छोड़ देते हैं। वे अपना जीवन तप में लगा कर नये तरीके से जीने लगते हैं। किन्तु अतीत की स्मृतियाँ भुलाने से भी नहीं भूलते हैं। एकांत जीवन बड़ा ही निर्मम होता है। एक रात उनके हृदय में वासना का जागरण होता है, किन्तु वहाँ मनु के शिवा कोई भी नहीं है। उनमे जीवन साथी की आशा बलवती होने लगती है। इस प्रकार दिन व्यतीत होने लगे थे किन्तु मनु अपने एकांकी जीवन से असंतुष्ट रहने लगे थे। प्रकृति के मनमोहक वातावरण में उनकी जीवन संगिनी की लालसा में वृद्धि होने लगी थी।

धीर-समीर-परस से पुलकित विकल हो चला श्रांत-शरीर,

आशा की  उलझी अलकों से उठी लहर मधुगंध अधीर।

श्रद्धा सर्ग- मनु इस बात से अनभिज्ञ थे कि जल-प्लावन में उनके अतिरिक्त भी कोई व्यक्ति जीवित है। मनु चिंता में थे तभी कामभोग की बालिका श्रद्धा का आगमन होता है। श्रद्धा गंधर्व देश की रहनेवाली थी जो भ्रमण करने के लिए निकली थी। हिमालय पर भ्रमण करते हुए श्रद्धा मनु के गुफा के निकट आई। उसने मनु से परिचय पूछा- श्रद्धा की मधुर और सहानुभूतिपूर्ण वाणी को सुनकर मनु को एक प्रकार से नया जीवन का एहसास हुआ।

“कौन तुम? संसृति-जलनिधि तीर तरंगों से फेकी मणि एक,

 कर  रहे  निर्जन का  चुपचाप प्रभा  की धरा से अभिषेक?”

सुना  यह मनु ने मधू गुंजार  मधुकरी का-सा जब सानंद

किये मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद।

श्रद्धा के सौंदर्य से मनु अभिभूत हो जाते हैं। उसके इस प्रश्न को सुनकर मनु का हृदय मधुररस से ओत-प्रोत हो जाता है। उन्होंने देखा कि उनके सामने गांधार देश के मुलायम रोम वालें भेड़ों की चर्म से ढकी हुई एक सुंदर बाला खड़ी है। मनु कहते हैं –

“नभ   धारिणी   बीच    जीवन   रहस्य   निरुपाय,

 एक उल्का-सा जलता भ्रांत, शुन्य में फिरता हूँ असहाय।”

मनु श्रद्धा से कहते हैं मैं एक भाग्यहीन व्यक्ति हूँ, जिसका जीवन सूत्र देवों के हाथों में है। मैने देवों के विलासमय जीवन को देखा है। इस संसार में सब कुछ नश्वर है। जो आज है वह कल नहीं होगा। जीवन का अंत निराशामय है। मनु के निराशा से भरी परिचय को सुनकर श्रद्धा मनु को जीवन के प्रति साकारात्मक दृष्टि अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। वह मनु से कहती है- ‘उठो और कर्म में प्रवृत हो जाओ’ वह मनु से यह भी कहती है कि “यह जीवन व्यर्थ में गवाने के लिए नहीं है। तुममे तो अपार शक्ति है। वह मनु को कर्मशील बनने की प्रेरणा देती है। उसने मनु से कहा देव संस्कृति से ध्वस्त मानव संस्कृति की सृष्टि करो। पर तुम अकेले आत्म विस्तार नहीं कर सकोगे मेरी सेवा तुम्हे समर्पित है। इस कार्य के लिए श्रद्धा अपने आपको मनु को समर्पित कर देती है। उसने मनु से कहा कि मनुष्य सृष्टि की शक्ति बिखरी पड़ी है यदि इसका समन्वय हो जाए तो मानव जाति सदा विजयी होगी।

काम सर्ग- श्रद्धा के संपर्क में आ जाने के बाद मनु के भावों में एक प्रकार की उथल-पुथल होने लगती है। उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगता है मानों जीवन में यौवन का प्रवेश हो रहा है। वे श्रद्धा के रहस्य को जानने के लिए उत्सुक हो रहे थे। एक ओर उनके मन में नई आशा, निश्चितता, स्वच्छंदता की भावना जागृत होती है तो दूसरी ओर उन्हें देवताओं के विलासी जीवन, निराशा और विरक्त की याद आने लगती है। मनु श्रद्धा के अलौकिक सौंदर्य की सराहना करके भी उससे दूर रहना चाहते हैं। मनु विचारों में डूबते हुए निंद्राधीन हो जाते हैं। उनका मन स्वप्न लोक में चला जाता है। तब वे कामदेव का संदेश सुनते है कि देव जाति के विनाश के कारण सृष्टि का विकास अवरुद्ध हो गया था। अतः उसके विकास के लिए उसकी पुत्री श्रद्धा को अपना लें। काम मनु को संबोधित करते हुए कहते हैं –  

“प्यासा  हूँ  मैं  अब भी प्यासा संतुष्ट ओध से मैं न हुआ,

 आया फिर भी वह चला गया तृष्णा को तनिक न चैन हुआ।”

मनु उस प्रेम कला तक पहुँचने का मार्ग पूछते हैं परन्तु जागने के बाद देखते हैं कि काम की ध्वनि बंद हो चुकी है। यही काम सर्ग की समाप्ति हो जाती है।

वासना सर्ग- यहाँ मनु और श्रद्धा एक साथ जीवन व्यतीत करने लगते हैं। किन्तु दोनों संकोच वश एक दूसरे से दूर रहते हैं। श्रद्धा मनु को अपने हृदय में स्थान नहीं दे पा रही थी।  जीवन निर्वाह के लिए श्रद्धा ने पशुपालन का कार्य प्रारंभ किया। अब मनु अतुल सम्पति, धान, आदि के स्वामी बन चुके थे। एक दिन श्रद्धा संध्या के समय एक बाल पशु के साथ खेल रही थी। श्रद्धा उसके अंगों को सहला रही थी और वह मूक पशु श्रद्धा के प्रति अपनी संवेदना पूछ हिलाकर व्यक्त कर रहा था। यह देखकर मनु के मन में ईर्ष्या की भावना जागृत हो जाती है। उनका हृदय व्यथित हो जाता है। उन्हें लगता है जितना प्रेम श्रद्धा उस  पशु से करती है उतना मुझसे नहीं करती है। वे सोचते है कि मुझसे तो अधिक भाग्यशाली वह पशु है जो मेरे द्वारा संचित किये गए अन्न पर पलता है। वह स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगते हैं। मनु के मन में अहम् जाग जाता है। श्रद्धा मनु के पास आकर उसके मनः भाव को समझ जाती है। श्रद्धा अपने कोमल हाथों से मनु को सहलाती है। उस वक्त मनु की ईर्ष्या कुछ समय के लिए समाप्त हो जाती है। इस क्रिया से मनु का मन शांत हो जाता है। श्रद्धा के स्नेहपूर्ण व्यवहार, अपूर्व सौंदर्य और प्रकृति के मादक वातावरण से मनु के मन में काम-वासना जागृत होती है। मनु के आत्म-समर्पण कर देने से श्रद्धा में नारी सुलभ लज्जा का संचार होने लगता है और वह शान्ति का अनुभव करती है।  

“स्पर्श  करने  लगी लज्जा ललित कर्ण कपोल,

खिला पुलक कदंब सा था भरा गदˎगदˎ बोल

किंतु  बोली  क्या  समर्पण  आज का हे देव,

 बनेगा – चिर – बंध – नारी – हृदय – हेतु-सदैव।”

लज्जा सर्ग- नारी के हृदय में लज्जा का उदय होना यह प्रकृति का प्रद्दत भावना है। नारी शरीर में लज्जा का उदय कैसे होता है। यहा प्रसाद ने सर्ग की प्रथम पंक्ति में ही अभिव्यक्त किया है।

“कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपति-सी

       गोधुली  के  धूमिल  पट में  दीपक के स्वर में दीप्ती-सी।”

लज्जा का उदय होना नारी का धर्म है। प्रसाद ने इस भाव का वर्णन काव्य शिल्प और काव्य सौष्ठव की दृष्टि से चर्मोत्कर्ष पर पहुँचा दिया है। काव्य सौष्ठव की दृष्टि से यह सर्वश्रेष्ठ सर्ग माना जाता है। श्रद्धा मनु को आत्मसमर्पण कर देती है। वह मनु को सांत्वना देना चाहती थी परन्तु लज्जा वश वह आगे नहीं बढ़ पाती है। उसके हृदय में अनेक भावनाएँ उमड़ने लगती है। वह मनु को सुख देना चाहती है, परन्तु लज्जा के कारण वह आगे नहीं बढ़ पाती है। लज्जा श्रद्धा को समझाते हुए कहती है। तुम मुझे देखकर चकित मत हो तुम अपने मन की चंचलता को दूर करो। प्रेम में कोई भी कदम उठाने से पहले तुम अच्छी तरह से विचार कर लो। मनु कहती है, ‘तुम ठीक कहती हो।’ मेरा मन पुरुष के सम्पर्क में आ चुका है। पुरुष से समता पाकर आत्मसमर्पण कर लज्जा चकित होकर कहती है। मैं तुम्हे नर आश्रित रहने से विचलित नहीं कर सकती पर आज से नारी के प्रति श्रद्धा और विश्वास का ही आश्रय रहेगा। तुम मनु का आश्रय लेकर जीवन की विषमताओं को मिटाकर सामंजस्य स्थापित करो। तुम्हें अपने आँसुओं से भीगे हए आँचल पर सबकुछ न्योछावर कर मधुर मुस्कान से प्रेम को निभाना होगा। तुम्हे पुरुष के अत्याचारों को सहते हुए भी हँसकर उसके साथ चलना होगा।

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पगतल में,

पीयूस-स्त्रोत- सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।

आँसू से भीगे अंचल पर मान का सब कुछ रखना होगा’

 तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।”

कर्म सर्ग- श्रद्धा बार-बार मनु को कर्मशील होने की प्रेरणा देती है। मनु के हृदय में कर्म की प्रेरणा का उद्दीपन होता है। इसी से मनु जीवन के लिए उपयोगी कर्म करने के लिए यज्ञ करने की योजना बनाने लगते हैं। उनके हृदय में श्रद्धा को पूर्ण रूप से अपनाने तथा सोमरस का पान कराने की उत्कृष्ट अभिलाषा जागृत होने लगी। सृष्टि के विनाश में असुर पुरोहित आकुलि और किलात भी बच गए थे। संयोग से वे दोनों उधर आ गए। भ्रमण करते हुए उन्होंने श्रद्धा के हृष्ट-पुष्ट पशु को देखा। आकुली का मन मांस भक्षण के लिए ललचने लगता है, परन्तु यह असंभव था। एक दिन मनु से उन्होंने विधिवत यज्ञ करवाने की और उससे सारी आकांक्षाएँ पूर्ण होने की बात कही। यज्ञ में पशुओं का बलि देना देवताओं के लिए आम बात थी। आकुलि जैसे पुरोहित के जाल में फँसकर मनु निश्चय करते हैं कि यज्ञ किया जाए। उससे एक नई उमंग जागेगी और श्रद्धा को भी अच्छा लगेगा। मनु यज्ञ करते हैं और श्रद्धा के पशु को बलि चढ़ाते हैं। यज्ञ समाप्ति के पश्चात श्रद्धा ने पशु हत्या के सारे चिन्ह देख लिए थे। यह देखकर श्रद्धा का मन बहुत आहत और दुःख से भर जाता है। वह गुफा में चली जाती है। रात्रि में शैय्या पर पड़ी-पड़ी वह संसार की निष्ठुरता सुख-दुःख पर विचार करती रही। मनु अपने सुख को ही सब कुछ मानने लगता है। श्रद्धा गहरी निंद्रा में थी। वे उसके पास जाकर उसे सहलाने लगे और कहने लगे यह तुम्हारी कैसी माया है। मैंने जिसे स्वर्ग बनाया है उसे तुम विफल मत करो। यह सोमरस अधरों से लगाओ और मस्ती से झूमों। श्रद्धा ने मनु से कहा’ आज तुम अपने ही भाव में बह रहे हो। क्या कल इसमें परिवर्तन नही होगा? कल तुम किसी और के साथ ऐसा करोगे। हे मनु! सब को जीने का अधिकार है। मनु ने कहा- “श्रद्धा हमारा अपने सुख भी बहुमूल्य है। दो दिन के जीवन के सुख का उपभोग तो सर्वस्व है। इस क्षणिक जीवन में मिलने वाले सुख को तुम तुच्छ कहती हो।” श्रद्धा ने कहा- “दूसरे प्राणियों के प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य होता है। मानवता का मूल अंग है अहिंसा, सेवा, स्वार्थ का त्याग और कर्म।”

इसप्रकार श्रद्धा का मन भी मादकता से भर जाता है। मनु श्रद्धा को समझाते हुए कहते हैं इसके बाद तुम जो कहोगी मैं वही करूँगा। मनु श्रद्धा को सोमरस देते हैं। श्रद्धा लज्जा-मग्न हो जाती है। मनु की वासना भरि आँखों में श्रद्धा की अनुराग भरी आँखें डूब गई। और दोनों का मिलन उस गुफा में हो गया।

ईर्ष्या सर्ग- श्रद्धा ने मनु को अपना सर्वश्व समर्पण कर दिया। मनु दिनभर शिकार के लिए घूमते-फिरते थे। उन्हें मांस भक्षण में आनंद आने लगा था। मनु और भी कुछ प्राप्त करना चाहते थे। श्रद्धा गर्भवती हो गई थी। गर्भ के कारण उसका मुख पीला पड़ गया था। श्रद्धा का अधिकांश समय धान एकत्रित करने, उसके बीजों को जमा करने और तकली काटने में बीतता था। मनु के मन में बार-बार नवीन लालसा जन्म लेती और शांत हो जाती है। अब वे श्रद्धा के प्रति उदासीन रहने लगे हैं। उन्हें यह जीवन बंदी जैसा लगने लगा है। श्रद्धा में अब पहले जैसी आकुलता, प्रेरणा, आकर्षण, उत्साह नहीं था। उन्हें श्रद्धा के प्रेम में उत्कट अभिलाषा के दर्शन नहीं होते हैं। एक संध्या को मनु काफी देर के उपरान्त शिकार कर के लौटे उनके हाथ में मरा हुआ हरिण था। उन्होंने उसे द्वार पर ही रख दिया और स्वयं भी थककर वहीं बैठ गए। श्रधा ने कहा- “तुम कहाँ भटकते रहते हो? तुम्हे किस वस्तु का अभाव है? जो इतनी व्याकुलता है, मैं अकेले शुन्यता का अनुभव करती रहती हूँ।” मनु क्षुब्धता से बोले- “तुम में वह अनुराग कहाँ है जो पहले था तुम दिन-रात तकली और धान एकत्रित करने में व्यर्थ श्रम करती रहती हो। मैं पशु का मांस और वस्त्र ला देता हूँ फिर यह श्रम क्यों? श्रद्धा बोली- स्वार्थ के लिए पशु हिंसा मुझे स्वीकार नहीं। श्रद्धा मौन रहकर अपनी बनाई हुई कुटिया उन्हें दिखाने के लिए ले गई। श्रद्धा को अपने भावी संतान के लिए व्यस्थता थी। उसने झुला दिखाते हुए कहा मैं कुछ समय के बाद माँ बनने वाली हूँ। यह ऊन उसी के लिए है। मनु को यह बात सहन नहीं हुई कि उसके प्रेम में कोई भागीदार बने मैं अकेला ही तुम्हारे प्रेम का अधिकारी हूँ यह कहकर मनु अपने ईर्ष्या से श्रद्धा को छोड़कर स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने के लिए चले गए।

इड़ा सर्ग- गुफा में श्रद्धा को अकेले छोड़कर मनु लक्ष्यहीन घूमते-घूमते सारस्वत प्रदेश पहुँच जाते है। जहाँ ध्वस्त खंडहर दिखाई दे रहा था। मनु वहाँ विश्राम करते हुए जीवन के संबंध में विचार करने लगे कि संसार क्या है? मनुष्य का जीवन क्या है? मनुष्य को कर्मठ होना चाहिए। अकर्मण्य मनुष्य स्वयं भी भयभीत रहता है और संसार को भी भयभीत करता रहता है। मनुष्य प्रतिक्षण जहाँ निर्माण करता है वहीं वह नाश करने में भी तत्पर रहता है। मेरे लिए हिमालय प्रेरणादायक नहीं, सूर्य ही मेरे लिए आदर्श है। मैंने कभी किसी पर दया नहीं किया। मैंने श्रद्धा के प्रेम को तोड़ा और स्वार्थ में लीन रहा। मैं सबको कष्ट ही देता रहा किसी को प्रसन्न नहीं कर सका। इसी कारण मैं कभी सफलता का मुँह नहीं देख सका।

  यहीं पर देवराज इंद्र ने असुरों पर विजय प्राप्त किए थे। यही देवासुर संग्राम मनु के मन में भी चल रहा था। तभी उनके कानों में काम का शाप सुनाई दिया कि तुम भौतिक सुख के लिए श्रद्धा को भूल गए हो। मनु तुम यह भी भूल गए हो कि पुरुष और नारी में कुछ समरसता होती है –

तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की,

समरसता  है संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की।

जिस प्रजातंत्र की तुम स्थापना करना चाहते हो वे सदैव पीड़ित रहेगी। मस्तिष्क हृदय के रहस्य के विरुद्ध चलेगा। जीवन में उचित और अनुचित का ज्ञान नष्ट हो जाएगा। तुम्हारा वर्तमान सुख से वंचित रहेगा और भविष्य संदिग्ध बनी रहेगी। इस शापित वाणी के पश्चात मनु चिंतित होकर सरस्वती के किनारे-किनारे आगे बढ़ते जा रहे थे।वहीं पर उनकी भेंट इड़ा से होती है। उसके परिचय से यह ज्ञात होता है कि वह उस प्रदेश की महारानी थी और उसका नाम इड़ा था। मनु ने जब उससे जीवन का मार्ग बताने के लिए अनुरोध किया तब उसने कर्मशील बनकर प्रकृति के रहस्य को खोलने का परामर्श दिया। इड़ा ने उन्हें अपने आश्रय के लिए निमंत्रण दिया और समझाया कि “यदि मनुष्य बुद्धि से काम करे तो वह अपने दुखों का विनाश कर सुख का भागी बन सकता है।” यह उजड़ा हुआ सारस्वत प्रदेश ही मेरा देश है। मुझे इसे फिर से बसाने के लिए किसी की सहायता चाहिए। मनु इड़ा के निमंत्रण को स्वीकार कर लेते हैं और सारस्वत प्रदेश के पुनर्निर्माण में लग जाते हैं।

स्वप्न सर्ग- मनु के चले जाने के बाद श्रद्धा अकेली ही हिमालय की वस्तृत गुफा में जीवन व्यतीत करती है। वह मनु के वियोग में दुखी रहती है और बीते हुए जीवन की घटनाओं को याद कर व्याकुल हो जाती है। उसका मन कुंठित हो जाता है। हृदय भर जाता है और आँखों में आँसू आने लगते हैं। उसी समय एक कोमल ध्वनि उसके कानों में सुनाई पड़ती है- ‘माँ’ यह सुनकर वह व्याकुल हो जाती है। वह ‘मानव’ था श्रद्धा का पुत्र जिसकी आवाज सुनकर श्रद्धा अपने अंक में भरने के लिए दौड़ पड़ती है। वह मानव से कहती है-

“कहाँ  रहा  नटखट  तू फिरता अब तक मेरा भाग्य बना,

अरे पिता के प्रतिनिधि तूने भी सुख दुःख तो दिया घना।”

माँ ने अपने बच्चे को दुलार किया और दोनों पुनः निंद्रा की सुखद गोदी में समाहित हो गए। श्रद्धा ने अर्द्धनिंद्रा अवस्था में स्वप्न देखा- “मनु ने एक सुंदर नगर बसाया हुआ है। वहाँ खेती हो रही है। फसले लगाई जा रही है। सभी प्राणी मिलकर परिश्रम कर रहे हैं। वह नगरी धन-धान्य और सम्पन्नता से परिपूर्ण है। वह चकित होकर चारों तरफ देखती है। उस नगर में बहुत ऊँचे-ऊँचे महल थे। उनमे से एक महल सोने के कलश से सुशोभित था। श्रद्धा ने मनु को इड़ा के साथ देखा। उसने देखा कि विलासिता में मग्न मनु विवेकशून्य होकर इड़ा के साथ अभद्र व्यवहार तथा अनाचार करने के लिए कटिबद्ध थे। मनु के इस व्यवहार से प्रकृति क्रुद्ध हो गई पृथ्वी काँपने लगी और आकाश में हलचल मच गई-  

“धूमकेतु सा चला रूद्र नाराज भयंकर लिए पूंछ में ज्वाला अपनी अति प्रलयंकर,

अन्तरिक्ष में महाशक्ति हुंकार कर उठी सब शस्त्रों की धारें भीषण वेग कर उठी।”

आकाश में देव शक्तियाँ क्रोधित होकर विचलित हो उठी। प्रजा मनु से प्रतिशोध लेने के लिए द्वार पर खड़ी थी। स्वप्न में यह दृश्य देखकर श्रद्धा काँप उठी। उसकी निंद्रा भंग हो गई। श्रद्धा के मन में मनु के लिए अनिष्ट की आशंकाएँ होने लगी इसी चिंता में रात बीत गई।

संघर्ष सर्ग- श्रद्धा ने जो सपना देखा था वह सत्य था। मनु के अनैतिक व्यवहार के कारण इड़ा स्वयं सकुचा रही थी। मनु शैया पर पड़े-पड़े सोचते हैं। मैने अपने बुद्धि-बल से लोगों को संगठित किया, सुखी बनाया और आज वे सब मेरे ही विद्रोही बन गए है। मैंने शासन के लिए नियमों का निर्माण किया परन्तु क्या मैं भी नियमबद्ध रहूँ। जब मैं श्रद्धा के ममतापाश को तोड़कर भाग सकता हूँ, तो इड़ा के अनुशासन में कैसे रह सकता हूँ? इस संसार में  सभी बंधनमुक्त हैं और सबकुछ परिवर्तन शील है। मनुष्य भी आवागमन की चक्की में पीसता जा रहा है। इस प्रकार समस्त संसार ही महाकाल का दास बना हुआ है। फिर क्यों न प्राप्त क्षणों का सुखमय उपभोग किया जाए?

इड़ा को देखते ही मनु के विचार की श्रृंखला टूट जाते हैं। इडा ने मनु से कहा- “यह सच है कि तुम शासक हो तुम्हीं ने इन नियमों का निर्माण किया है। परन्तु तुम्हें भी नियमबद्ध होना चाहिए। संसार में वही अवशिष्ट है, जो शक्तिशाली है। शासक की शक्ति स्वार्थ को छोड़कर प्रजा के हित में होना चाहिए।” मनु बोले, यह कैसे हो सकता है कि मैं शासक होकर भी अपनी उपभोग्य वस्तु का उपभोग नहीं कर सकू। दैवीय प्रकोप से मैं नहीं डरता। मनु का मन वासनासक्त हो रहा था। इड़ा के साथ उनका अनुचित व्यवहार देखकर प्रजा ने विद्रोह कर दिया। आकुलि और किलात प्रजाजनों का नेतृत्व कर रहे थे। उनमे और मनु में भीषण संग्राम हुआ। इस संग्राम में सहस्त्रों व्यक्ति आहत हुए और मनु भी मुर्छित हो गए थे।

निर्वेद सर्ग- मनु और प्रजा के बीच घोर संघर्ष के बाद समस्त सारस्वत प्रदेश दुखी दिखाई देता है। इड़ा सोचने लगती है “यह मानव कितना क्रूर है। इसने मेरी पूजा की हत्या कर दिया। उसे मनु के पतन से ग्लानी होती है। उस सुने राजमंदिर में मनु अचेत पड़े थे। इड़ा के अतिरिक्त वहाँ कोई भी नहीं था। तभी उसे दूर से आती हुई एक ध्वनि सुनाई पड़ती है। वह श्रद्धा थी। श्रद्धा अपने पुत्र मानव के साथ मनु को खोजती हुई आई थी। श्रद्धा ने मनु को जब घायल अवस्था में देखा तब वह विलाप करने लगी। मनु ने उसे पहचान लिया। श्रद्धा ने अपने कोमल हाथ से उसे सहारा दिया। श्रद्धा के प्रेम पूर्वक स्पर्श से मनु की व्यथा दूर हो गई। बालक भी पिता को पाकर आनंदित हुआ। पति-पत्नी और पिता-पुत्र का मिलन हुआ। मनु को अत्यंत सुख मिला। मनु निर्वेद से दबे हुए श्रद्धा से कहने लगे “तुमने मुझे जीवन का रहस्य बताया है।” मनु श्रद्धा से कहीं दूर ले जाने का आग्रह करते हैं। परन्तु श्रद्धा ने मनु से कहा, वे अभी स्वस्थ नहीं हैं। उन्होंने कहा, श्रद्धये! प्रलय से बचने के बाद तुमने मुझे सहारा दिया। प्रेम और विश्वास भी दिया। तुमने मुझे पुंजीभूत किया कष्टों को सहने की शक्ति दिया। परन्तु मैं स्वार्थी तुम्हारा मूल्य नहीं समझ सका। मैं बड़ा ही पापी हूँ मेरी अंतरात्मा बहुत दुखी है। मेरी कामना है कि तुम अपने बालक के साथ सुखी रहो। प्रातः हुआ तो मनु का कहीं पता नहीं था। वे सबको सोते हुए छोड़कर चले गए थे।

दर्शन सर्ग- मनु के चले जाने के बाद श्रद्धा मनु को पुनः ढूँढने के लिए निकल जाती है। सरस्वती नदी के किनारे इड़ा और मानव भी मनु को ढूँढने के लिए आते हैं। मनु के अपराधों के लिए श्रद्धा ने इड़ा से क्षमा याचना किया। इड़ा ने कहा, “नहीं अपराध तो स्त्री पुरुष दोनों से होता है। क्षमा कर देना सबसे बड़ा दूषण होगा। मुझे दुःख इस बात का होता है कि व्यक्ति अपने द्वारा किये गए अपराध को नहीं मानता है। भगवान् ने मनुष्य को बुद्धि दिया है, परन्तु मनुष्य उस बुद्धि का दुरुपयोग कर रहा है। अपने कर्तव्य को भूलकर सभी वैमनस्य से जले जा रहे हैं। समझ में नहीं आता है कि जो नियम मनुष्य बनाते हैं वही नियमों को भंग क्यों करते हैं? मनुष्य को इस विनाश से कैसे रोका जाए? यह तो सर्वत्र फैल गया है। श्रद्धा ने इड़ा को उतर देते हुए कहा, “तुम्हारी स्थिति जनता की नहीं है। तुम्हारे पास दिल नहीं है। श्रद्धा अपने पुत्र मानव को इड़ा के पास रहकर सुखद कार्य द्वारा शासन प्रबंध करने की आज्ञा देती है। श्रद्धा ने मानव से कहा कि इड़ा में तर्क की प्रधानता है। तुझमे विश्वास की अतः तुम सारे राज्य को सुव्यवस्थित कर समाज में समानता की भावना का प्रसार करना। वहीं नदी के निर्जन तट पर एक गुफा में श्रद्धा ने मनु को देखा। मनु ने इड़ा का तिरस्कार करते हुए श्रद्धा के गुणों का वर्णन किया। उसी समय अन्धकार को चीरती हुई एक विराट शक्ति उत्पन्न हुई। वे शिवजी थे जो तांडव नृत्य में लीन थे। इसके कारण एक ओर तामसी पदार्थों का नाश हो रहा था और दूसरी ओर सात्विक पदार्थीं की सृष्टि हो रही थी। शिव को इस मुद्रा में देख कर उनके चरणों तक ले जाने के लिए मनु ने श्रद्धा से अनुरोध किया। जहाँ पहुँचकर सभी पाप-पुण्य पावन होकर आनन्द ही आनन्द होगा।         

रहस्य सर्ग– मनु के अत्यधिक आग्रह करने पर श्रद्धा उन्हें लेकर हिमालय पर चढ़ने लगी। श्रद्धा मनु को एक समतल भूमि पर ले आई जहाँ उसे एक नवीन चेतन का उदय हुआ। वहाँ उन्होंने तीन बिन्दु अथार्त तीन लोक को देखा इच्छा, क्रिया और ज्ञान। श्रद्धा ने कहा कि इन तीनों के अलग रहने के कारण ही जीवन में दुःख आते हैं।

“ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है इच्छा क्यों पूरी हो मन की’

एक दूसरे  से न मिल सके  यह  विडंबना है जीवन की।”

इतना कहते ही श्रद्धा की एक मुस्कान से तीनों लोक परस्पर मिल गए। वह मिलकर एकाकार हो गए। शिव का तांडव होने लगा। समस्त दिशाओं में ज्ञान का प्रसार होने लगा। जिसे देखकर श्रद्धा और मनु तन्मय हो गए। उन्हें अलौकिक अनहद नाद सुनाई देने लगता है। दोनों उसमे तल्लीन हो गए।

आनंद सर्ग– मानव ने इड़ा के सहयोग से पुनः सारस्वत नगर को व्यवस्थित कर दिया। वहाँ के निवासी सुख-समृधि के साथ बिना भेद-भाव के परिवार की तरह अपना जीवन यापन करने लगे। एक दिन इड़ा और मानव भी अपने सभी के साथ कैलास यात्रा के लिए निकले। इस दल के साथ धर्म का प्रतीक एक वृषभ (बैल) भी था। मानव युवा हो चूके थे। मानसरोवर के पास ही मनु तपस्या में थे। यहाँ पहुँचकर इड़ा श्रद्धा और मनु के पारस्परिक प्रेम और तपस्या के स्वरुप को देखकर स्वयं को धन्य समझने लगी। मानव ने अपनी माँ को स्नेहपूर्वक आलिंगन में भर लिया। इड़ा ने अपने आने का कारण बताते हुए कहा कि वह अपने पापों का नाश करने आए हैं। मनु मुस्कुराकर बोले यहाँ कोई पराया नहीं है हम सभी ब्रह्ममय हैं। यहाँ कोई भी प्राणी दुखी नहीं है।

“सब भेद-भाव भुलवा कर दुःख-सुख को दृश्य बनाता

मानव कह रे! यह मैं हूँ, यह विश्व नीड़ बन जाता।”

इसके पश्चात कैलास पर बसंत ऋतु छा गई। समस्त प्रकृति प्रफुल्लित हो उठी। चारों तरफ सुगन्धित वायु बहने लगी, वल्लरियाँ नृत्य करने लगी, पिक कूकने लगे, भ्रमर गूँजने लगे आदि। इस दिव्य अलौकिक सौंदर्य को देखकर सभी आनंद विभोर हो गए। सभी भेदभाव मिटाकर परम सत्ता के अखंड आनंद में डूब गए। हिमालय की पाषाणी प्रकृति मंगलमय हो रही थी। प्रसाद जी इस सर्ग के अंतर्गत कहते हैं-

“समरस थे जड़ या चेतन सुंदर साकार बना था,

चेतनता एक विलासती आनंद अखंड घना था।”

सारांश- छायावाद का प्रमुख आधारस्तंभ ‘कामायनी’ महाकाव्य है। यह पंद्रह सर्गों में विभाजित है। इसे नायिका प्रधान काव्य कहा जाता है। कामायनी में पात्रों के व्यक्तित्व और अंतर्मन का सामंजस्य पूर्ण निर्वाह किया गया है। प्रसाद ने मनोवैज्ञानिक आधार लेकर मानव की मनोभावनाओं का बड़ा ही सुंदर चित्रांकन है। उन्होंने इसमें शैवदर्शन के प्रत्याभिज्ञादर्शन उल्लेखित समरसता सिद्धांत का भी गहनता एवं परिपूर्णता के साथ निरूपण किया है। इसमें प्राचीन देव संस्कृति के विकास और अधःपतन के माध्यम से मानव जीवन के विकास की कथा को रूपायित किया गया है। छायावादी कविता के गुण-दोष भी इस महाकाव्य में स्पष्ट परिलक्षित होता हैं। इसमें कवि की मौलिक कल्पना, पात्र सृष्टि, प्रकृति का बहुआयामी चित्रण, मनोवैज्ञानिकता, प्रतीकात्मकता, गहन चिंतन मनन सभी साकार एवं एकाकार हो गया है। कामायनी अपनी काव्य गरिमा और महानता के कारण विद्धानों में आज भी चर्चा—परिचर्चा, चिंतन-अनुचिंतन और शोध का निरंतर आकर्षण रहा है।

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