जयशंकर प्रसाद कृत ‘ध्रुवस्वामिनी (नाटक)

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय- जन्म (1889 -1937) उपनाम ‘कलाधर’,

रचना लेखन: ‘ब्रजभाषा’ में।

नाटक: सज्जन (1911), कल्याणी परिणय (1912) (जो नागरी प्रचारणी सभा से प्रकाशित हुआ था), प्रायश्चित (1913), करुणालय (1913), राज्य श्री (1915), विशाखा (1921), अजातशत्रु (1922), कामना (1923) में लिखा गया और प्रकाशन 1927 ई० हुआ, जनमेजय का नागयज्ञ (1926), स्कंदगुप्त (1928), एक घूँट (1929), चन्द्रगुप्त (1931), ध्रुवस्वामिनी (1933), अग्निमित्र (अपूर्ण)

काव्य:

खण्डकाव्य: प्रेमपथिक (1914), महाराणा का महत्व (1914)

महाकाव्य: कामायनी (1935)

मुक्तक काव्य: कानन कुसुम (1913), चित्राधार (1918)

गीति काव्य: झरना (1918), आँसू 1925 ई०, लहर 1933 ई०

कहानी संग्रह: छाया (1912), प्रतिध्वनि (1926), आकाशदीप (1929), आँधी (1931), इंद्रजाल (1936)।

उपन्यास: कंकाल (1929),  तितली (1934),  इरावती (1938)

निबंध: काव्यकला और अन्य निबंध

चंपू काव्य: उर्वशी (1906), वब्रुवाहन (1907)

माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में- “कविता प्रसाद का प्यार है, उनका गद्य उनका कर्तव्य है।”

‘ध्रुवस्वामिनी’ (नाटक)

  • ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक 1933 ई० में प्रकाशित हुआ था।
  • ध्रुवस्वामिनी एक ऐतिहासिक नाटक है। यह नाटक इतिहास की प्राचीनता में वर्तमान काल की समस्या को प्रस्तुत करता है। इसमें गुप्त काल का कथानक है।
  • इसकी कथावस्तु गुप्तवंश के यशस्वी सम्राट समुन्द्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त के काल से सम्बंधित है।
  • यह जयशंकर प्रसाद जी का अंतिम नाटक था। इस नाटक में ऐतिहासिकता के साथ-साथ कल्पना का भी समन्वय है। इसकी कथावस्तु गुप्तवंश के यशस्वी सम्राट समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त के काल से संबंधित है।
  • ध्रुवस्वामिनी नाटक की आत्मा भारतीय और शरीर विलायती है।
  • इसमें कुल अंक तीन (3) हैं। इसमें दृश्य विधान नहीं है, प्रत्येक अंक के एक दृश्य और चार (4) गीत है।
  • नायिका ध्रुवस्वामिनी और नायाक चन्द्रगुप्त है। यह नायिका प्रधान नाटक है।
  • इस नाटक का आधारग्रंथ विशाखदत्त द्वारा ‘देविचंद्र्गुप्त’ नाटक है। नाटक में ध्रुवस्वामिनी का नाम ‘ध्रुवदेवी’ है।

ध्रुवस्वामिनी नाटक दो कारणों से काल्पनिक है:  

पहला- विशाखादत्त द्वारा रचित संस्कृत नाटक देविचंद्र्गुप्त में ध्रुवस्वामिनी के पुनर्विवाह (चन्द्रगुप्त के साथ) का उल्लेख है। चन्द्रगुप्त द्वारा शकराज को मारना और ध्रुवस्वामिनी से पुनर्विवाह ऐतिहासिक तथ्य है।

दूसरा- ध्रुवस्वामिनी नाटक के चन्द्रगुप्त, रामगुप्त, शकराज. शिखरस्वामी ऐतिहासिक पात्र है।

नाटक में काल्पनिकता

इस नाटक में कोमा मंदाकिनी और मिहिरदेव जैसे काल्पनिक पात्र है।

कोमा के माध्यम से गौण कथा का सृजन किया गया है।

शकराज के अनैतिक आचरण को पुष्ट करने के लिए कल्पना का सहारा किया गया है।

पुरुष पात्र-

चन्द्रगुप्त: (नायक) समुंद्रगुप्त का छोटा बेटा, रामगुप्त का भाई, योग्य उत्तराधिकारी, वीर, साहसी, ध्रुवस्वामिनी का प्रेमी किंतु कलह के कारण राजसिंहासन और ध्रुवस्वामिनी का त्याग।  

रामगुप्त: (राजा और चन्द्रगुप्त का भाई) समुंद्रगुप्त का बड़ा बेटा, स्वार्थी, विलासी, ध्रुवस्वामिनी का पति, शिखरस्वामी के हाथों का कठपुतली है। राम गुप्त शकराज के साथ युद्ध करने के डर से ध्रुवस्वामिनी को सौंपना चाहता है।     

शिखरस्वामी: (अमात्य) रामगुप्त का विश्वास पात्र। शिखार स्वामी के सहयोग से राम गुप्त राजा बन जाता है।   

पुरोहित: धर्मशास्त्र का आचार्य

शकराज: (शत्रु राजा) कोमा का प्रेमी तथाध्रुवस्वामिनी के प्रति आकृष्ट और प्रतिद्वंदी शासक। चन्द्रगुप्त के द्वारा मृत्यु।

खिंगिल: काल्पनिक पात्र    

मिहिरसेन: शकराज के आचार्य, कोमा का धर्म पिता और कुशल राजनीतिज्ञ।  

नारीपात्र

ध्रुवस्वामिनी: नाटक की नायिका, रामगुप्त की पत्नी, चन्द्रगुप्त की प्रेमिका। साहसी, वीर, आत्मसम्मानी। ध्रुवस्वामिनी युवराज चन्द्रगुप्त की पत्नी बनने वाली थी लेकिन सत्ता पलते के कारण रामगुप्त शासक बनकर ध्रुवस्वामिनी को पत्नी बना लेता है।  

मंदाकिनी: काल्पनिक पात्र है। रामगुप्त और चन्द्रगुप्त की बहन है। न्यायप्रिय कर्तव्यनिष्ठ निर्भीक विवेकशील तथा शोषण के विरुद्ध विरोध करती है।

कोमा:  काल्पनिक पात्र है। शत्रुरानी, शकराज की प्रेमिका, मिहिरदेव की पुत्री है।

खडग धारिणी: (राम गुप्त की गुत्चार)

गौण पात्र- शकराम (दूसरा शत्रु राजा),

मिहिरदेव: (कोमा के पिता), कुबड़ा, बौना, हिजड़ा, प्रतिहारी, खडग धारिणी, पुरोहित, खिंगल और सामंत कुमार।

‘ध्रुवस्वामिनी’ कथावस्तु :

इस नाटक के सन्दर्भ में जयशंकर प्रसाद जी का कहना था- “यह ठीक है कि हामारे आचार्य और धर्मशास्त्र की व्यावहारिक परंपरा विछिन्न-सी है। आगे जितने सुधार या समाजशास्त्र के परीक्षात्मक प्रयोग देखे या सुने जाते हैं, उन्हें अचिंतित और नवीन समझकर हम बहुत शीघ्र अभारतीय कह देते है, किन्तु मेरा ऐसा विश्वास है कि प्राचीन आर्यावर्त में समाज की दीर्घकालव्यापिनी परंपरा में प्रायः प्रत्येक विधान का परीक्षात्मक प्रयोग किया गया है। तात्कालिक कल्याणकारी परिवर्तन भी हुए हैं। इसलिए डेढ़ हजार वर्ष पहले यह होना अस्वाभाविक नहीं था क्या होना चाहिए और कैसा होगा, यह तो व्यवस्थापक विचार करें इतिहास के आधार पर जो कुछ हो चूका या जिस घटना के घटित होने की सम्भावना है, उसी को लेकर इस नाटक की कथावस्तु का विकास किया गया है।”   

‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक:

ध्रुवस्वामिनी नाटक के तीन अंक है।

प्रथम अंक रामगुप्त के शिविर से आरंभ होता है।

दूसरा अंक शकराज के शिविर से आरम्भ होता है।

तीसरा और अंतिम अंक शकदुर्ग के भीतरी प्रकोष्ट में होता है और वहीं ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक का अंत हो जाता है।  

नाटक का कथानानक: सम्राट समुन्द्रगुप्त के दो पुत्र थे। चन्द्रगुप्त और दूसरा रामगुप्त। रामगुप्त दुराचारी, विलासी और कामुक था। वह सम्राट बनने के लिए सर्वथा अयोग्य था। इसलिए सम्राट समुन्द्रगुप्त अपने छोटे पुत्र चन्द्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं। परन्तु रामगुप्त अपने अमात्य शिखरस्वामी के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचता है और चन्द्रगुप्त की वाग्दत्ता पत्नी (मंगेतर) ध्रुवस्वामिनी से विवाह कर लेता है और स्वयं राजसिंहासन पर अधिकार कर लेता है। इसके बावजूद भी चन्द्रगुप्त रामगुप्त को सम्राट स्वीकार कर लेता है। ध्रुवस्वामिनी भी धीरे-धीरे अपने आपको परिस्थितियों के अनुसार ढालने लगती है।

शकराज गुप्त साम्राज्य से अपने पुरखों के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए खिंगिल के माध्यम से रामगुप्त के पास एक प्रस्ताव भेजता है। यदि वह अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है तो उसके लिए उपहार स्वरुप अपनी महारानी ध्रुवस्वामिनी और हमारे सभी श्रीमंतों के लिए स्त्रियाँ भेज दे। रामगुप्त शकराज की बढ़ते हुए शक्ति से पहले ही भयभीत है। इसलिए वह अपने मंत्री शिखरस्वामी के मंत्रणा के बाद राज्य के हित को ध्यान में रखकर महारानी ध्रुवस्वामिनी और शकराज के सभी श्रीमंतों के लिए अपनी अपनी स्त्रियाँ भेजने के लिए तैयार हो जाता है। ध्रुवस्वामिनी को जब इस बात का पता चलता है तब वह सीधे निर्भीक होकर अमात्य  को चुनौती देते हुए कहती है-

‘मैं केवल यही कहना चाहती हूं कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-संपत्ति समझकर उन पर अत्याचार करने का जो अभ्यास बना लिया है, वह मेरे साथ नहीं चल सकता।’

चंद्रगुप्त अंतर्मन से ध्रुवस्वामिनी के प्रति अनुरक्त है। लेकिन राजमर्यादा के कारण वह अपना  मनोभाव प्रकट नहीं होने देता। ध्रुवस्वामिनी भी इस सत्य से अवगत है। वह राजा की आज्ञा से ध्रुवस्वामिनी के साथ शकराज के पास जाने के लिए तैयार हो जाता है। आचार्य मिहिरदेव शकराज को चेताते हुए कहते है- ‘स्त्री का सम्मान नष्ट करके तुम जो अपराध करोगे, उसका फल क्या अच्छा होगा?’ लेकिन विनाश काले विपरीत बुद्धि। जैसे ही स्त्री भेष धारण कर चन्द्रगुप्त ध्रुवस्वामिनी के साथ जब शकराज को एकांत में मिलता है तो ध्रुवस्वामिनी का भेष धारण किए हुए चंद्रगुप्त शकराज को चुनौती देते हुए कहता है- “मैं हूँ चन्द्रगुप्त तुम्हारा काल अकेला आया हूं तुम्हारी वीरता की परीक्षा लेने-सावधान!” 

चंद्रगुप्त शकराज से युद्ध में उसकी हत्या कर देता है और ‘देवी ध्रुवस्वामिनी की जय हो’ का सामंत कुमारों का समवेत स्वर सुनाई देता है। ध्रुवस्वामिनी नारी सशक्तीकरण की जैसे प्रतिमूर्ति प्रतीत होती है। वह रामगुप्त को तत्काल दुर्ग से बाहर निकलने का आदेश देती है और नाटक ध्रुवस्वामिनी के चन्द्रगुप्त के वरण के निर्णय के साथ समाप्त होता है

नाटक में पुरूष सत्तात्मक समाज के शोषण के प्रति नारी का विद्रोही स्वर सुनाई पड़ता है। वैसे प्रताड़ित स्त्री की अवस्था का चित्रण इस नाटक में मुख्य है। परन्तु नारी-स्वतंत्रता के भाव से परिपूर्ण आधुनिक चेतना के कारण ही इसमें पहली बार ‘ध्रुवस्वामिनी’ प्रतिक्रिया करती है।

इस नाटक में कोमा के द्वारा प्रेम को परिभाषित किया गया है। कोमा ध्रुवस्वामिनी से कहती है-

रानी, तुम भी स्त्री हो, क्या स्त्री की व्यथा नहीं समझोगी? आज तुम्हारी विजय का अंधकार तुम्हारे शाश्वत स्त्रीत्व को ढक ले, किंतु सबके जीवन में एक बार प्रेम की दिपावली जलती है। जली होगी अवश्य। तुम्हारे भी जीवन में वह आलोक का महोत्सव आया होगा, जिसमें ह्रदय ह्रदय को पहचानने का प्रयत्न करता है, उदार बनता है और सर्वस्व दान करने का उत्साह रखता है। मुझे शकराज का शव चाहिए।

ध्रुवस्वामिनी से शव लेकर वह मिहिरदेव के साथ चली जाती है किंतु रास्ते में रामगुप्त के सैनिक उसकी हत्या कर देते हैं। इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी से बेहतर प्रेम करना और उसके लिए त्याग करना शायद ही अन्य कोई पात्र कर सकता था। प्रसाद की ध्रुवस्वामिनी प्रेम के अंतर्सघर्ष और विवाह की मर्यादा, इन दोनों पाटों के बीच पिसती रहती है। इसके विपरीत कोमा का प्रेम उसकी आँखों के सामने कुम्हलाने लगता है। वह अपने प्रेमी की वास्तविकता से अनभिज्ञ है। यहाँ कह सकते हैं कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसकी एक खास छवि हमारे हृदय में होती है, जो सभी अच्छाई-बुराई को दरकिनार कर देती है। किंतु कभी यह छवि टूट जाने पर भी कुछ लोग प्रेम-पात्र के साथ बंधे रहना चाहते हैं। लेकिन कोमा के व्यक्तित्व को प्रेम ने पूर्ण किया है, उसे दास नहीं बनाया है। इसलिए वह शकराज के प्रेम को ठुकरा देती है-

प्रेम का नाम न लो। वह एक पीड़ा थी, जो छूट गई। उसकी कसक भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगी। राजा, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती। मैं तो दर्प में दीप्त तुम्हारी महत्वमयी पुरुष-मूर्ति की पुजारिन थी, जिसमें पृथ्वी पर अपने पैरों से खड़े रहने की दृढ़ता थी। इस स्वार्थ-मलिन कलुष से भरी मूर्ति से मेरा परिचय नहीं।

लेकिन प्रेम की विडंबना ही यही है कि प्रेम-संबंधों में दुराव आने के बावजूद उसकी एक धुंधली रौशनी जीवन में बनी रहती है। प्रेम में समर्पण और त्याग होता है। कोमा का प्रेम भी शकराज के प्रति समर्पण और त्याग है। इसलिए शकराज के तिरस्कार के बाद भी उसकी मृत्यु होने पर कोमा शव माँगने ध्रुवस्वामिनी के पास पहुँच जाती है।

रामगुप्त को ध्रुवस्वामिनी से प्रेम नहीं है बल्कि उसके प्रति स्वामित्व का भाव रखता है। विवाह के बाद एक बार भी उसने ध्रुवस्वामिनी से शारीरिक संबंध नहीं बनाया। ध्रुवस्वामिनी जानती है कि रामगुप्त को विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत के आनंद से अवकाश कहाँ है? रामगुप्त उसे अपनी विवाहिता मानकर उसपर अपना पूर्ण अधिकार रखता है। वह ध्रुवस्वामिनी से कहता है- तुम उपहार की वस्तु हो। आज मैं तुम्हे किसी दूसरे को देना चाहता हूँ, इसमें तुम्हें क्यों आपत्ति हो? अर्थात् समाज में ऐसे अधिकतर पुरुष हैं जो स्त्री को मात्र वस्तु समझते हैं। रामगुप्त के जैसे ही शकराज को भी स्त्री केवल उपभोग व मनोरंजन की वस्तु लगती है। कोमा पूछती है- तो क्या आपकी दुश्चिंताओं में मेरा भाग नहीं? मुझे उससे अलग रखने से क्या वह परिस्थिति कुछ सरल हो रही है?

गौर करने की बात यह है कि स्त्री का हरण या अपहरण सामाजिक मान-अपमान का पैमाना बन गया है। यदि युद्ध होते हैं तो स्वयं को बचाने के लिए पुरुष परिवार की स्त्रियों को भेंट स्वरूप दे देते थे या स्त्रियों का हरण कर लिया जाता था। अर्थात् स्त्री को समाज के प्रत्येक युद्ध में अपने अस्तित्व की आहुति देनी पड़ती है।

जयशंकर प्रसाद ‘ध्रुवस्वामिनी’ में प्रेम की अवधारणा के साथ आनंद और वेदना का गहरा आख्यान करते हैं, लेकिन विवाह की परंपरागत व्यवस्था की जटिलताओं में उलझ कर तोड़ नहीं पाते। वह विवाह संस्था को भारतीय परिप्रेक्ष्य में सही मानते हैं। लेकिन यदि विवाह त्रासदी का रूप धारण कर ले तो प्रसाद उससे मुक्ति पर भी बल देते हैं। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में इसी नारी मुक्ति प्रमाण निहित है। शकराज युद्ध में मारा जाता है और ऐसी स्थिति में भी ध्रुवस्वामिनी विवाहेतर संबंध और विवाह मुक्ति के द्वंद्व में फंसी हुई है। वह चंद्रगुप्त का वरण कर सकती है, किंतु उसे अपने प्रेम के झुकाव के प्रति गहरा संदेह होता है। वह मंदाकिनी से कहती है-

दुर्ग की विजय मेरी सफलता है या मेरा दुर्भाग्य, इसे मैं नहीं समझ सकी हूँ। राजा से मैं सामना करना नहीं चाहती। पृथ्वीतल से जैसे एक साकार घृणा निकल कर मुझे अपने पीछे लौटने का संकेत कर रही है, क्यों, क्या यह मेरे मन का कलुष है? क्या मैं मानसिक पाप कर रही हूँ?

ध्रुवस्‍वामि‍नी और चंद्रगुप्‍त का पुनर्लग्‍न प्रसाद की प्रगति‍शीलता है क्‍योंकि‍ पौरूष के बल पर स्त्री को दासी माननेवाले रामगुप्‍त की मृत्यु के बाद वह अपनी इच्‍छा से चंद्रगुप्‍त का वरण करती है।

डॉ. ओझा के अनुसार- स्वामिनीनाटक का उद्देश्य स्त्री के पुनर्विवाह की समस्या को प्रकाश में लाना है।

इस नाटक में मंदाकिनी जैसे पात्रों की सृष्टि की गई है जो जड़ शास्त्र के खिलाफ आवाज उठाती है कि जिन स्त्रियों को धर्म-बंधन में बांधकर, उनकी सम्मति के बिना आप उनका सब अधिकार छीन लेते है, तब क्या धर्म के पास कोई प्रतिकार, कोई संरक्षण नहीं रख छोड़ते, जिससे वे स्त्रियाँ अपनी आपत्ति में अवलम्ब मांग सके।

प्रसाद ने इस नाटक में स्त्री की विभिन्न समस्याओं को उठाया है किंतु इन समस्याओं को भारतीय चिंतन और परंपरा के आधार पर ही ढूँढने का प्रयास किया है। इस नाटक की कथावस्तु स्त्री संघर्ष पर आधारित है और स्त्री-संघर्ष की समाप्ति पर ही अंत दिखाया गया है। अर्थात् ध्रुवस्वामिनी की कथा भी ध्रुवस्वामिनी के संघर्ष से विकसित हुई है और उसके समापन के साथ ही समाप्त हुई है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में ‘अतिप्राकृतिक, त्रासद जैसे विपदाओं का भी समावेश है जो संयोग और आकस्मिकता को महत्व देता है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में आधिकारिक कथा के अन्तःसूत्र प्रासंगिक कथा के साथ इस तरह जोड़े गए हैं कि वे दोनों एक हो गई हैं। कोमा का प्रसंग ध्रुवस्वामिनी के मूल कथा सूत्र से अलग होते हुए भी उसका एक भाग बन गया है। दोनों कथाएँ नारी समस्या को लेकर चलती हैं। प्रसाद ने इस नाटक के माध्यम से एक ओर स्त्री-जीवन से जुड़ी समस्याओं पर विभिन रूपों में दृष्टिपात किया है तो दूसरी ओर गुप्तकालीन इतिहास के उन धुंधले पृष्ठों को भी सामने लाने का प्रयत्न किया है जिसके बारे में अधिकांश इतिहासकार अनभिज्ञ हैं। प्रसाद के ‘ध्रुवस्वामिनी’ में अयोग्य शासक की व्यवस्था पर अंकुश, राष्ट्र सम्मान की भावना, अक्षम और दोषी शासक को दण्डित करने के भाव निहित हैं। लेकिन इसका मूल उद्देश्य ‘स्त्री मुक्ति और अस्मिता’ है। वर्तमान समय में स्त्री मुक्ति की जो बात कही जाती है प्रसाद ने उसे वर्षों पहले अनुभव कर लिया था और अपने नाटक में उसकी अभिव्यक्ति भी की है। प्रसाद ने अपने इस नाटक में नारी के अस्तित्व, अधिकार, पुनर्विवाह की समस्या को उठाया है। अतः प्रसाद का नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ समाज में स्त्री चिंतन के विभिन्न दृष्टिकोणों को समग्रता में लिए हुए ऐतिहासिक व काल्पनिक कृति है।

निष्कर्ष: ध्रुवस्वामिनी में इसी ओर संकेत है कि स्त्री की मुक्ति तभी संभव है, जब व्यवस्था में परिवर्तन हो। नयी व्यवस्था में नयी नैतिकता और विधिशास्त्र’ को लाया जाये। तभी स्त्री की मुक्ति और अस्तित्व में नया आयाम आ सकेगा। नारी मुक्ति से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि क्या विवाह ही स्त्री के जीवन का लक्ष्य है? क्या स्त्री की नियति एक पुरुष से दूसरे पुरुष तक भटकने की है? इन सभी सवालों के जवाब ध्रुवस्वामिनी’ ने दिया है और यह प्रतिपादित करती है कि पुरुष यदि गौरव से नष्ट और आचरण से पतित हो, तो वह स्त्री के योग्य नहीं है। रामगुप्त से मुक्त हो कर ध्रुवस्वामिनी अकेले जीवन यापन कर सकती है लेकिन वह किसी से प्रेम करती है। प्रेम के लिए आज तक त्याग देने के बाद उसे आखिरकार चन्द्रगुप्त का प्रेम मिल गया है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ की नाटकीय घटनाएँ इतिहास के जिस काल में घटती है, वहां शायद प्रसाद के प्रश्नों ने उस व्यवस्था को हिला दिया होगा।

अंत में चन्द्रगुप्त ध्रुवस्वामिनी से विवाह कर लेता है। और चन्द्रगुप्त सम्राट और ध्रुवस्वामिनी साम्राज्ञी बन जाती है।

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