सुशीला (संस्मरण)

सावन का महीना था। गांव में चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही थी। कभी रिमझिम हल्की सी फुहार, कभी जोर से बरसात, कभी काली घटाओं का घिरना और चले जाना तो कभी बिजली कड़कना और जोर से बरसना। ये सभी प्राकृतिक क्रियाएं मन को बहुत ही लुभा रही थी। गाँव के सभी लोग अपने-अपने दुआर पर बैठ कर इस लुभावने मौसम का आनंद ले रहे थे। तभी घर के अन्दर से बड़ी दीदी बोली। अरे! देखो तो दुआर पर सब लोग बाहर से आ गए हैं। बड़े बाबा बोले, हाँ सब लोग आ गए हैं। यहीं दुआर पर बैठें हैं। बड़ी दीदी को विश्वास नहीं हुआ वह झट से अन्दर से बाहर आकर चारों तरफ देखने लगी और तुरंत बोली- ‘धूरी’ भैस लेकर फुलवारी में गया था। मौसम खराब है। वो अभी तक नहीं आया है। मैं उसको मना की थी कि आज फुलवारी में भैस लेकर मत जाना। मौसम ठीक नहीं है, लेकिन वह नहीं माना। धूरी अभी तक नहीं आया है। मुझे डर लग रहा है। बड़े बाबा बोले बर्षा छूटते ही वह आ जाएगा तुम घबराओं मत। कही छुप गया होगा बच्चा थोड़ी है। बड़ी दीदी का मन घबरा रहा था। घर के सभी लोग बोलने लगे अरे! आ जाएगा, आ जाएगा घबराओं मत। सब लोग अभी बातें ही कर रहे थे कि अचानक बड़ी जोर से बिजली कड़की दुअरा पर बैठे सभी लोग डर गए और अपने-अपने कान बंद कर लिए। कुछ तो डर से एक दूसरे को पकड़ कर लिपट गए। बड़ी दीदी भी घबराने लगी। माँ का दिल था न, घबराती कैसे नही?

एक बात और पता नहीं क्यों जब कभी भी कोई घर से बाहर जाता है, तब माँ के मन में सिर्फ बुरा ही ख्याल आता है, अच्छा ख्याल तो कभी आता ही नहीं है, पता नहीं क्यों? क्या ऐसा सभी माँ के साथ होता है? या किसी-किसी के साथ। सुमित्रा दीदी बोली, अरे! बड़ी खतरनाक बिजली कड़की है जरुर कहीं न कहीं गिरी होगी। सच कहते हैं प्रकृति का रूप जितना लुभावना और सुन्दर होता है, उतना ही विकराल, डरावना और घातक भी। कभी-कभी तो प्रकृति इतनी बेरहम होकर ऐसा जुल्म करती है, जिसका कोई पारावार ही नहीं होता।

यह बिहार के एक गांव की कहानी है। यह बहुत बड़ा गांव है। इस गांव में दो टोला है। उतर टोला और पूरब टोला। दोनों टोला के लोग एक दूसरे के खान-पान, शादी-व्याह और दुःख-सुख में साथ मिलकर रहते हैं। गांव के लोग अच्छे पढ़े-लिखे हैं। खेती-बारी करने में भी माहिर हैं। गाँव में खेती-बारी भी खूब होती थी। बच्चे बड़ों के साथ मिलकर-जुलकर खेती का काम बड़े ही चाव से करते हैं। अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देते हैं। गाँव के अधिकतर लोग सरकारी नौकरी में अच्छे-अच्छे पदों पर आसीन हैं। गांव के दो बच्चों में बहुत ही गहरी दोस्ती थी। एक का नाम धूरी और दूसरे का नाम नभ था। धूरी उत्तर टोला में रहता था, और नभ पुरुब टोला में। गांव वाले के अनुसार बचपन से ही दोनों में गहरी दोस्ती थी। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। दोनों बचपन से ही साथ-साथ खेले-कूदे और बड़े हुए। दोनों की शादी भी एक ही वर्ष हुई, सिर्फ महीना में अंतर था। सबसे खुशी इस बात की थी कि दोनों की पत्नियाँ भी एक ही महीना आगे-पीछे गर्भवती भी हुई थी। दोनों दोस्त अपनी-अपनी बातें करते और हँसी-मजाक भी किया करते थे। यहाँ तक कि गाँव के लोग भी इन दोनों से मजाक किया करते रहते थे। नौकरी नहीं होने के कारण दोनों अपने गाँव में ही खेती-बारी करते थे। अपने घर-परिवार के साथ सुखी और खुश थे। शाम के समय जब गाँव के सब लोग इकटठा होते तब अपनी-अपनी बातों के साथ-साथ इन दोनों की भी बातें करते और मजा लेते थे।

एक सुबह दोनों दोस्त नाश्ता करके अपने-अपने भैंस को लेकर चवर में चले गए। उस दिन मौसम ठीक नहीं था। धूरी की माँ पहले ही बोली थी। आज कहीं बाहर मत जाना मौसम ठीक नहीं है। धूरी बोला, ठीक है। लेकिन दोनों दोस्त अपनी-अपनी भैस लेकर चवर चले गए। अचानक जोर से बादल गरजा और वर्षा होने लगी। दोनों दोस्त भैंस को खेत में छोड़कर फुलवारी में एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए थे। थोड़ी देर बाद जोर से बिजली कड़की और वह बिजली उन दोनों के नजदीक ही गिरी थी। उस आकाशीय बिजली के गिरते ही दोनों दोस्त वहीं पर गिर गए थे। कुछ समय बाद पूरे गाँव में हल्ला हो गया। गाँव के बगीचा में बिजली गिरी है। उस बिजली के गिरने से वहाँ दो लड़के थे। वे दोनों भी गिर गए हैं। गाँव के सभी लोग बगीचे की तरफ दौड़कर भागने लगे। वहाँ पर लोगों की भीड़ लग गई थी। उन दोनों को उठाकर गाँव के लोग हॉस्पिटल की ओर भागते हुए गए। डॉक्टर ने तो धूरी को मृत घोषित कर दिया। उसकी मौत हो चुकी थी। मौत की खबर सुनते ही गाँव में कोहराम मच गया। दूसरा गम्भीर रूप से जल गया था। भगवान के कृपा से उसकी जान बच गई। इस दुर्घटना से गाँव के लोग बहुत दुखी थे। आकाशीय बिजली ने इन दोनों की दोस्ती को हमेशा-हमेशा के लिए अलग कर दिया। नभ को जैसे ही होश आया उसने तुरंत पूछा धूरी कैसा है? उसके घर वालों ने कहा, ठीक है। घर आने के बाद भी उसे किसी ने कुछ नहीं बतया। कुछ दिनों के बाद नभ हॉस्पिटल से घर आ गया। घर आने के बाद नभ को पता चला कि उसका दोस्त अब इस दुनिया में नहीं रहा। वह बहुत रोया और दुखी हुआ। धूरी के मृत्यु के ठीक दसवें दिन भगवान ने सुशीला पर एक और जुल्म कर दिया। उसका बच्चा समय से पहले ही मृत पैदा हुआ। इस खबर को सुनते ही पूरा गाँव और भी दु:ख के सागर में डूब गए। सभी के मुँह से बस एक ही शब्द निकल रहा था। भगवान! ये तूने उस बच्ची पर कैसा जुल्म किया? कम से कम उसकी निशानी को तो छोड़ देना था। इस दुःख के वातावरण में सभी मौन थे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। यह सब समय का चक्र है। धीरे-धीरे समय सबकुछ सीखा देता है। साथ में रहना भी और अलग भी। वैसे इस तरह कि घटनाएँ बारिस के दिनों में हर वर्ष होती रहती है। खास कर बिहार और उतर प्रदेश में तो अधिकतर होती है। इस कहानी को लिखने का मकसद है कि कभी भी बरसात के समय घर से बाहर नहीं निकले। अपनी सुरक्षा का ध्यान रखें। जीवन है तो सबकुछ है।

2 thoughts on “सुशीला (संस्मरण)”

  1. इस कहानी ने मुझे याद दिला दिया उन दिनों की जब मैं पूर्णिया में पदस्थापित था। जिस दिन तेज बारिश होती थी, उस दिन बारिश के साथ आकाशीय बिजली का गिरना मैं उधर ही देखा। बारिश के दूसरे दिन कुछ लोगों की मृत्यु का समाचार अवश्य छपता था।

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