भारतीय संस्कृति और राष्ट्र

भूमिका- भारतीय संस्कृति प्राचीन एवं गौरवपूर्ण है। विश्व संस्कृति के इतिहास में इसका विशिष्ठ स्थान है। इस संस्कृति को समृद्ध और समुन्नत बनाने में हमारे ऋषियों, मुनियों, साधू-संतों, दार्शनिकों, विचारकों, आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गुरु वेदव्यास, बाल्मीकि, कालिदास, स्वयंभू, पुष्पदंत, संत तुलसीदास, संत कबीर दास, गरुनानक देव, गुरुगोविंद सिंह, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा आदि ऐसे महान संत, कवि और लेखक थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति में जीवन्तता प्रदान किया है, और भारतीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर दीप्तिमान किया है।

संस्कृति का अर्थ: संस्कृति का अर्थ ‘सुधरी हुई स्थिति’ होता है। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। वह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों तरफ की प्राकृतिक परिस्थितियों को निरंतर सुधारता और उन्नत करता रहता है। वह प्रत्येक जीवन-पद्धति, रीती-रिवाज, रहन-सहन, आचार-विचार, नवीन अनुसंधान का अविष्कार कर पशुओं और जंगलियों के दर्जे से ऊँचा उठकर सभ्य बना है। सभ्यता संस्कृति का अंग है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति होती है और संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति होती है। मनुष्य केवल भौतिक परिस्थितियों में सुधार करके ही संतुष्ट नहीं रह सकता है। वह सिर्फ भोजन से ही नहीं जीता है। उसके ‘शरीर’ के साथ उसका ‘मन’ और ‘आत्मा’ भी है। भौतिक उन्नति से सिर्फ शरीर की भूख मिट सकती है, किन्तु इससे मन और आत्मा अतृप्त ही रहेंगे, जिसे संतुष्ट करने के लिए मनुष्य विकास और उन्नति करता है, उसे संस्कृति कहते है। इस प्रकार मानसिक क्षेत्र में उन्नति ही उसके प्रत्येक ‘सम्यक कृति’ की संस्कृति बन जाती है।

किसी भी राष्ट्र की महानता एवं उसके गरिमामयी व्यक्तित्व का निर्माण उसकी उत्तम संस्कृति एवं सामाजिक परम्पराओं पर निर्भर करता है। भारतवर्ष अपनी विशालता और आदर्शमयी जीवनधारा के कारण ही पूरे विश्व भर में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की प्राकृतिक दृश्य, जीवन दर्शन और लोगों का सौंदर्य, उनकी आत्मीयता, विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, मतों, विचारों और भावनाओं की विविधताओं के बावजूद भी राष्ट्र के सन्दर्भ में एकमत होना यहाँ की महानता है। डॉ विजयेन्द्र स्नातक भारत की महान परम्पराओं से जुड़े जीवन मूल्यों को व्यक्त करते हुए लिखते हैं- “भारतवर्ष आध्यात्मिक सम्पदा से संपन्न, सांस्कृतिक अवधारणाओं से पल्लवित, धार्मिक चेतना से ओत-प्रोत और आस्तिक जीवन मूल्यों की विविध घटनाओं से संश्लिष्ट एक ऐसा देश है जो धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति एवं साहित्य चिंतन आदि नाना पद्धतियों से संपृक्त होकर एक में अनेक की प्रतीति कराता है।”1 संस्कृति हमारे जीवन के अन्दर में व्याप्त है। जिस प्रकार फूल के अन्दर सुगंध छिपा होता है, उसी प्रकार संस्कृति का स्वरुप है। संस्कृति वास्तव में मनुष्य जीवन का सर्वस्व है। डॉ वासुदेव अग्रवाल के शब्दों में- “संस्कृति मनुष्य के भूत वर्तमान और भावी जीवन का सर्वांग पूर्ण प्रकार है। हमारे जीवन का ढंग संस्कृति है। जीवन के नानाविध रूपों का समुदाय संस्कृति है।” वे इसे मानव जीवन का प्रेरक शक्ति मानते हुए ‘विश्व के प्रति अनन्त मैत्री की भावना’ कहते हैं। उनके अनुसार “विचार और कर्म के क्षेत्र में राष्ट्र का जो सृजन है, वही उसकी संस्कृति है।”2 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लिए “मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएं संस्कृति है। उनके मत में संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की परिणति है…. भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता है।”3 जीवन के प्रति सामूहिक दृष्टिकोण से संस्कृति का निर्माण होता है। स्वामी करपात्री जी संस्कृति को जीवन के प्रत्येक पक्ष का आंतरिक स्वरुप कहते हैं। स्वामी करपात्री जी के कथन के अनुसार– “मनुष्य के लौकिक, परलौकिक, धार्मिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, राजनितिक अभ्युदय के उपयुक्त देहेंन्द्रिये, मन, बुद्धि, अहंकार आदि की भूषणभूत चेष्टाएँ एवं हलचल ही संस्कृति है।”4 अतः संस्कृति मानव जीवन के उत्थान का आतंरिक तत्व है।

संस्कृति का अर्थ और परिभाषा:

संस्कृति शब्द संस्कृत के ‘कृ’(करना) धातु से बना है। इस धातु से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’(मूल स्थिति), ‘संस्कृति’(परिष्कृत स्थिति), और ‘विकृति’(अवनति स्थिति)। इसके साथ ‘सम्’ उपसर्ग लगाकर कर संस्कृति बना है, जिसका अर्थ होता है ‘सम्यक कृति’। दूसरे शब्दों में संस्कृति का अर्थ है- संस्करण, परिमार्जन, शोधन, परिष्करण। अंग्रेजी में संस्कृति का पर्याय ‘कल्चर’ है। ‘कल्चर’ की व्युत्पति लैटिन शब्द ‘कल्टन’ से हुई है, जिसका अर्थ होता है, भूमि को जोतकर उसे विकसित बनाना।   

सामान्य अर्थ में संस्कृति सीखे हुए व्यवहारों की सम्पूर्णता है, किन्तु संस्कृति की अवधारणा इतनी व्यापक है कि उसे एक वाक्य में परिभाषित करना सम्भव नहीं है। मानव द्वारा अप्रभावित प्राकृतिक शक्तियों को छोड़कर जितनी भी मानवीय परिस्थितियाँ हैं, जो हमें चारों ओर से प्रभावित करती हैं। उन सभी की सम्पूर्णता को हम संस्कृति कहते हैं। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के शब्दों में- “संस्कृति एक ऐसा गुण है, जो हमारे जीवन में छाया हुआ है। यह एक आत्मिक गुण है, जो मनुष्य के स्वभाव में उसी प्रकार व्याप्त है, जिस प्रकार फूलों में सुगंध और दूध में मक्खन। इसका निर्माण एक या दो दिन में नहीं बल्कि युग-युगांतर में होता है। जिस प्रकार संस्कृति जन्य निर्माण कठिन है, उसी प्रकार इसका नष्ट होना भी। संस्कार हजारों सालों में निर्मित होते हैं।”5

भारतीय राष्ट्र का जीवन मूल्य मूलतः संस्कृति की साधना का प्रतिफल है, जो सदियों से मानवता के मनोरम भाव के रूप में विद्यमान है। इसीलिए भारतीय संस्कृति सराहनीय है। मुहम्मद इकबाल ने भारत राष्ट्र की संस्कृति के जीवन मूल्यों को अपनी वाणी के माध्यम से अत्यंत ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया है-

“यूनान, मिश्र रोमां सब मिट गए जहाँ से

अब तक मगर है बाकी नामोनिशाँ हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमाँ हमारा।”6

उपरोक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि ‘संस्कृति’ शब्द अपने आप में इतनी विस्तृत है कि इसकी सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। परन्तु इन सभी परिभाषाओं का अवलोकन करने पर हम संस्कृति का एक सामान्य अर्थ निकाल सकते हैं। इसमें व्यवहार और विचार दोनों हैं जो हम अपने पहले पीढ़ी से लेते हैं और आने वाली पीढ़ी को देते है। अतः कहा जा सकता है कि वे सभी भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ जिनका निर्माण मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया है, वे सभी संस्कृति के अंतर्गत आती हैं।      

संस्कृति की विशेषताएँ:

भारतीय संस्कृति वैदिक संस्कृति है। यह मूलतः सिन्धु संस्कृति है। इस संस्कृति पर अनेक संस्कृतियों ने अघात किया है। उन अनेक आघातों को सहन करने के बाद भी इस संस्कृति की विशेषताएँ ज्यों की त्यों बनी हुई है। इस पर अनेक संस्कृतियों का प्रभाव भी पड़ा है। संस्कृति के अनेक पक्ष होते हैं, जिसके फलस्वरूप संस्कृति का निर्माण होता है। संस्कृति संचयी होती है। इसमें शामिल अनेक ज्ञान, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है। जैसे-जैसे समय बितता जाता है, वैसे-वैसे अधिक से अधिक ज्ञान विशिष्ट संस्कृति के साथ जुड़ता चला जाता है। संस्कृति परिवर्तनशील होती है। समय के अनुसार किसी भी विशिष्ट संस्कृति में सांस्कृतिक परवर्तन संभव होता रहता है। भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन  और समृद्ध संस्कृति है। अन्य कई देशों की संस्कृतियाँ समय की धारा के साथ नष्ट हो गई, किन्तु भारत की संस्कृति आदिकाल से ही अजर-अमर है। इसकी उदारता ने कई संस्कृतियों को अपने आप में समाहित किया है और अपने मूल को बचाए रखा है। यही कारण है कि आज भी पाश्चात्य विद्वान अपने देश की संस्कृति को समझने के लिए भारतीय संस्कृति को पहले समझने का परामर्श देते हैं।

भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(क) राष्ट्रीयता की भावना- राष्ट्रीयता की भावना संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता एवं अस्तित्व की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य होता है। भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीन विरासत के लिए जानी जाती है। अपनी राष्ट्र की रक्षा करने के लिए स्वयं भगवान भी अलग-अलग युगों में अवतार लिए हैं। ऋषि मुनियों से लेकर संत-महात्माओं, समाज सुधारकों कवि साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने भी अपनी मात्रभूमि के लिए सेवाभाव को महत्व दिया है। राष्ट्र के मान-सम्मान के लिए अनेक वीर योद्धाओं ने बलिदान दिया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था- “जब तक करोड़ों भूखे और अज्ञानवश लोग मरते रहेंगे, मैं हर उस व्यक्ति को विश्वासघाती ठहराऊंगा जो उस भूख के एवज शिक्षित बना, किन्तु उसके उत्थान के लिए कुछ नहीं करता” स्वामी जी का यह कथन शिक्षित व्यक्ति के दायित्व की तरफ संकेत करता है और इसमें राष्ट्र सेवा की भावना भी निहित है। सभी शिक्षित और साधन संपन्न व्यक्तियों का यह कर्तव्य बनता है कि वे राष्ट्र के बेहतर निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। निरक्षरता देश के लिए कलंक है। साक्षरता विकास की अनिवार्य शर्त है, केवल शिक्षा के लिए ही नहीं, अपितु सूचनाओं और विचारों के आदान-प्रदान का भी साधन है। विकास केवल सड़क, बिजली, कल-कारखाने, बाँध, पाठशाला, विधालय, विश्वविद्यालय का ही नहीं होता है। बुनियादि तौर पर विकास लोगों की जीवन प्रक्रिया और शिक्षित होने से जुड़ा है। मनुष्य का सम्पूर्ण विकाश ही सबसे अधिक मूल्यवान है और संस्कारों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक, अध्यात्मिक और ज्ञान की परम्परा को दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित करना राष्ट्र और संस्कृति बचाव के लिए जरुरी है।” साहित्य की दृष्टि से देखा जाए तो कोई भी साहित्यकार राष्ट्रीय भावना से अछुता नहीं है। रचनाकार की प्रत्येक रचना में राष्ट्रभावना निहित होती है। वह तो उसकी आत्मा में बसती है। उन भावनाओं को रचनाकार अपने रचना के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। साहित्यकारों में भारतेंदु हरिश्चन्द्र, मैथलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आदि साहित्यकारों के साथ भारत की आत्मा कहे जाने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार मखानलाल चतुर्वेदी के राष्ट्रभक्ति को परिहार जी ने वर्णन करते हुए कहा है- “प्रसाद जी देशप्रेम और राष्ट्रीय चेतना को ऐतिहासिक नाटकों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे थे। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों के सामने होकर माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान तथा बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने खुल्लम-खुल्ला विरोध किया। सन् 1930 में जबलपुर सेन्ट्रल जेल में वे फिरंगियों को फटकारते हुए कहते हैं-

क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना?

हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश-राज का गहना,

कोल्हू का चरक हूँ? जीवन की तान,

मिट्टी पर अँगुलियों ने लिखे गान?

हूँ मोट खींचता लगा पेट जुआ,

खाली करता हूँ ब्रिटिश अक्कड़ का कुआँ।7

इस तरह प्रेम, वीरता और भक्ति के स्वर चतुर्वेदी जी की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति में मुखरित हुई।

(ख) प्राचीनता- भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति में से एक है। मध्य प्रदेश में ‘भीमबैठका’ में पाया गया शैल चित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य पुरातत्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चूका है कि भारत भूमि आदि-मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि थी। सिन्धु घाटी की सभ्यता के विवरणों से भी प्रमाणित होता है कि आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले उत्तरी भारत के बहुत से बड़े भाग में एक उच्च कोटि की संस्कृति का विकास हो चूका था। वेदों में परिलक्षित भारतीय संस्कृति केवल प्राचीनता का प्रमाण ही नहीं है, अपितु वह भारतीय आध्यात्म और चिंतन का भी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर भारतीय, रोम और यूनानी संस्कृति को प्राचीन तथा मिश्र, असीरिया एवं बेबिलोनिया जैसी संस्कृतियों को समकालीन माना गया है। 

(ग) निरंतरता- भारतीय संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह हजारों वर्षों के बाद भी अपने मूल रूप में ही जीवित है, जबकि रोम, मिश्र, असीरिया यूनान आदि की संस्कृतियों का मूल रूप लगभग समाप्त हो गया है। भारत में आज भी नदियों, वट, पीपल, जैसे वृक्षों, सूर्य-चाँद तथा अन्य प्राकृतिक देवी-वीदेवताओं की पूजा अर्चना शताब्दियों से चलता आ रही है। वेदों, पुराणों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतियों की आज भी आस्था और विश्वास घटी नहीं है। गीता और उपनिषद् के सन्देश हजारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्मों के आधार रहे हैं। आज भी करोड़ों भारतीय अपने आपको उन मूल्यों एवं चिंतन प्रणाली से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। इससे वे ज्ञान और प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

(घ) ग्रहणशीलता- भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता एवं उदारता होने के कारण उसमे ग्रहण करने की प्रवृति भी है। जिस संस्कृति में लोकतंत्र स्थायित्व के आधार व्यापक हैं, उस संस्कृति में ग्रहणशीलता की प्रवृति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो जाती है। हमारी संस्कृति में यहाँ के मूल निवासियों ने समन्वय की प्रक्रिया के साथ ही बाहर से आने वाले हूण, शक, यूनानी और कुषाण जैसी प्रजातियों के लोग हमारे साथ घुल-मिलकर अपनी पहचान को भूल गए हैं। अब भारतीयता ही उनकी पहचान हो गई है। भारत में इस्लामी संस्कृति का आगमन भी अरबों, मुगलों और तुर्कों के माध्यम से हुआ था। इसके बावजूद भी भारतीय संस्कृति का एक अलग अस्तित्व रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय संस्कृति ने नई आने वाली संस्कृतियों को ग्रहण करने में संकोच नहीं किया है। यूरोपीय जातियों के आने तथा ब्रिटिश साम्राज्य के कारण भारत विकसित हुआ। यह इसाई संस्कृति पर भी लागू होती है। यधपि अब ये संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृतियों का अंग बन चुकी हैं। भारतीय इस्लाम एवं भारतीय इसाई संस्कृतियों का स्वरुप विश्व के अन्य इस्लामी और अन्य इसाई धर्मावलम्बी देशों से कुछ भिन्न हैं। इस भिन्नता का मूलभूत कारण यह है कि भारत के अधिकांश मुसलमान और इसाई भारत भूमि के ही निवासी हैं। संभवतः इसी कारण उनके सामजिक परिवेश और सांस्कृतिक आचरण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और अब तो भारतीयता ही उनकी पहचान बन गई है।

(ङ) लचीलापन और सहिष्णुता- सहिष्णु प्रकृति ने भारतीय संस्कृति को दीर्घ आयु और स्थायित्व प्रदान किया है। इतनी सहनशीलता संसार के किसी भी संस्कृति में शायद नहीं होगी। भारतीय हिन्दुओं पर धर्म या संस्कृति के नाम पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसीलिए प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रतिक हिन्दू धर्म को धर्म नहीं कहकर कुछ मूल्यों पर आधारित जीवन-पद्धति की संज्ञा दी गई है। भारतीय संस्कृति के इस लचीले स्वरुप में जब भी जड़ता की स्थिति हुई, तब किसी न किसी महापुरुष ने इसे गतिशीलता प्रदान कर, इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया। प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, संत कबीर, गुरुनानक, और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में स्वामी दयानन्द एवं स्वामी विवेकानन्द के द्वारा सहिष्णुता को पोषित किया गया। यही प्रयास संस्कृति की मुख्य धरोहर है।  

(च) आध्यात्मिकता एवं भौतिक समन्वय- भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक रही है। आत्मा के द्वारा परमात्मा के आनंद को प्राप्त करना आध्यात्मिकता का लक्ष्य होता है। भारतीय संस्कृति में आश्रम व्यवस्था थी। इस व्यवस्था के साथ धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष चार पुरुषार्थों का विशिष्ठ स्थान था। इन पुरुषार्थों ने ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का एक अद्भुत् समन्वय कर दिया। हमारी संस्कृति में जीवन के ऐहिक और पारलौकिक दोनों पहलुओं से धर्म को जोड़ दिया गया है। धर्म उन सिद्धांतों, तत्वों और जीवन प्रणाली को कहते हैं, जिसमे मानव परमात्मा के द्वारा दिये गये शक्तियों के विकास से अपना लौकिक जीवन सुखी बना सके। मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा शांति का अनुभव कर सके। शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। अमरता मोक्ष से जुड़ी हुई है। मोक्ष को पाने के लिए अर्थ और काम के साथ पुरुषार्थ करना भी जरुरी है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति में धर्म और मोक्ष, अर्थ और काम की भौतिक अनिवार्यता में परस्पर सम्बन्ध है। सुखी मानव जीवन के लिए ऐसी चिंता विश्व की अन्य कोई भी संस्कृतियाँ नहीं करती हैं। साहित्य, कला, संगीत आदि अन्य सम्पूर्ण  विधाओं के माध्यम से भी भारतीय संस्कृति के इस आध्यात्मिक एवं भौतिक समन्वय को सरलता पूर्वक समझा जा सकता है। मोक्ष प्राप्त करना ही मानव का अंतिम लक्ष्य होता है।

(छ) अनेकता में एकता- भारत में विभिन्न धर्म, जाति, साम्प्रदाय, खान-पान एवं रीति-रिवाज के लोग रहते हैं। भौगोलिक दृष्टि से देश की स्थिति, बनावट और जलवायु में विविधता है। इस विशाल देश में उत्तर के पर्वतीय भू-भाग जिसकी सीमा पूर्व में ब्रह्मपुत्र और पश्चिम में सिन्धु नदी तक विस्तृत है। इसके साथ ही गंगा, यमुना, सतलज की उपजाऊ कृषि भूमि, पश्चिम में थार का रेगिस्तान, दक्षिण का तटीय प्रदेश तथा पूर्व में असम और मेघालय के अतिवृष्टि के सभी क्षेत्र सम्मिलित हैं। इन भौगोलिक विभिन्नता के अतिरिक्त हमारे देश में आर्थिक और सामजिक विभिन्नता भी पर्याप्त रूप से विद्यमान हैं। इन भिन्नताओं के होते हुए भी भारत में अनेक सांस्कृतिक उपधाराएँ विकसित और पल्लवित हुई हैं। हिमालय सम्पूर्ण देश के गौरव का प्रतीक है, तो गंगा, यमुना, नर्मदा और गोदावरी जैसी नदियों की स्तुति लोग प्राचीन समय से ही करते आ रहे हैं। राम, कृष्ण, शिव की पूजा सदियों से होती आ रही है। भारत के सभी भाषाओं में इन देवताओं पर आधारित साहित्य का सृजन हुआ है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सम्पूर्ण भारत में जन्म, विवाह, और मृत्यु आदि संस्कार एक सामान प्रचलित हैं। भाषाओं की विविधता अवश्य है। विभिन्न पूजा-पाठ, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, गीत-संगीत के सात स्वर और नृत्य आदि में भी समानता है। भारत अनेक धर्मों, मतों, सम्प्रदायों का महादेश है।

(ज) अहिंसा- अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव की हत्या नहीं करना अथार्त सभी जीवों  के साथ प्रेम करना।भारतीय गुरु, गुरु गोविन्द सिंह अहिंसावादी नीतियों के प्रबल समर्थक थे। सम्पूर्ण जीवन में उन्होंने अपनी ओर से कभी भी युद्ध प्रारम्भ नहीं किया। समस्त युद्ध अपनी आत्म रक्षा के लिए ही लड़ा। भारत पर जब-जब विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय सांस्कृतिक और सम्पदा को नष्ट करने का प्रयास किया, तब-तब भारतीयों ने अहिंसावादी प्रवृति एवं विवेक का सहारा लेकर उन आक्रान्ताओं के सामूहिक शक्ति को केवल समाप्त ही नहीं किया, अपितु उनकी सांस्कृतिक सम्पदा के श्रेष्ठ गुणों को भारतीय संस्कृति में समाहित भी कर लिया। भारतियों का यही विवेक उनके मन से क्रोध और अंहकार की दुष्प्रवृतियों को दूर रखता है। अहिंसात्मक प्रवृति मनुष्य को प्रेम और साहचर्य की भावना के लिए प्रेरित करती है। गुरु गोविन्द सिंह भारत के शक्तियों से पुर्णतः परिचित थे। इसलिए उन्होंने निराशा को अपने जीवन पर कभी भी छाने का अधिकार नहीं दिया। उन्होंने दशम ग्रन्थ में मानव जीवन में व्याप्त विसंगतियों का खण्डन किया और नए मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित कर जान-साधारण में जागृति कि भावना को जगाया। वे भावात्मक रूप में सहृदय कवि थे। उनकी ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ की संयुक्त शक्ति का भारत सदैव ऋणी रहेगा। भारत ने विश्व को जो दिया उससे विश्व का विकास हुआ। अन्यथा विश्व की गति हमेशा स्थिर थी। विश्व को भारत ने- ‘शून्य’ और ‘दशमलव’ दिया जिससे करोड़ो वर्ष नक्षत्रों की गणना संभव हो सकी। यदि ये नहीं होते तो आज विज्ञान की स्थिति अनिश्चित होती। भारत ने विश्व को ‘अहिंसा का सिद्धांत’ दिया जिसने मानव को मानव के प्रति सहिष्णु बनाया। अतः यह स्पष्ट होता है कि सत्य, अहिंसा, ज्ञान आदि का मार्ग प्रशस्त करने में हमारे गुरुओं महापुरुषों, राष्ट्र भक्तों एवं महान हस्तियों ने अपना-अपना योगदान दिया है।

(झ) सर्व व्यापकता- भारतीय संस्कृति सर्व व्यापक है। इस संस्कृति ने भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों जैसे- चीन, जापान, फ़्रांस, साइबेरिया और बोर्निया के द्वीपों से लेकर प्रशांत सागरीय द्वीपों तक अपने साहित्यों, कथाओं, रीती-रिवाजों आदि का प्रचार-प्रसार किया है। विश्व भर में जो पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं, उनसे यह साबित होता है, कि भारतीय संस्कृति विश्व के हर कोने तक बसी हुई है। जापान हो या न्यूजीलैंड, यूरोप हो या अफ्रीका या अमेरिकी प्रायद्वीप। हर जगह भारतीय और उनकी संस्कृति फैली हुई है। भारतीय अपने ज्ञान-विज्ञान के साथ विश्व के जिस देश में जाते हैं, वहाँ वे अपने सहज, सरल स्वभाव से वहाँ के लोगों का दिल जीत लेते हैं। चाहे संस्कृत हो या पाली भाषा, योग हो या ध्यान, आर्युवेद हो या हथकरघा, शास्त्रीय संगीत हो या नाट्यकला सबका प्रसार-प्रचार इस तरह से किया कि जिससे सबका भला हो। भारतीयों का लक्ष्य विश्व कल्याण रहा है। इसी से भारतीय संस्कृति सर्वव्यापी हो गई है।

(ञ) ईश्वरोपासना– भारत के जनमानस में आस्थावादी प्रवृति विद्यमान रही है। यहाँ के लोग प्राचीन काल से ही ईश्वर में विश्वास रखते हैं। किसी भी अच्छे कार्य को शुरू करने से पहले ईश्वर का स्मरण किया जाता है। इस प्रवृति के रहते व्यक्ति बुरे कामों को करने में डरता है। भारतीय संस्कृति ने समाज और व्यक्ति दोनों को सदा ही आस्थावान रहने के लिए समय-समय पर अनन्त ज्योतिर्मय ईश्वर के प्रति जागृत रहने के लिए आध्यात्मिक सन्देश प्रसारित किये हैं। आर्यावर्त का मानव समुदाय ईश्वर में विश्वास रखता है। इस कारण हर अच्छे-बुरे काल में स्वतः ही मुख से ईश्वर का नाम निकल ही जाता है। 

(ट) प्रवासी भारतीय- प्रवासी भारतियों ने भी भारतीय संस्कृति को विश्व भर में फैलाने का कार्य किया है। विश्व में प्रवासी भारतीय अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। आज भारत के बाहर कई देशों में शासनाध्यक्ष भी भारतीय हैं। इनमे आयरलैंड में मराठी मूल के और पुर्तगाल में गोवा मूल के प्रधानमन्त्री हालिया हैं। प्रवासी भारतीय दिवस नौ जनवरी 1915 को महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने के उपलक्ष में मनाया जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में प्रवासी भारतियों की संख्या तीन करोड़ बारह लाख है। इनमे से एक करोड़ तीस लाख उन प्रवासियों की हैं जो एक समय गिरमिटिया कहे जाते थे। ये वे लोग हैं जिनके पूर्वजों को अंग्रेज शासक मजदूरी करने के लिए मोरिसस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद आदि देशों में ले गए थे। इनमे से बड़ी संख्या में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग थे। इनकी सबसे खास बात यह है कि इन्होंने खुद को अपनी पुरानी परम्परा यानि भारतीय संस्कृति से जोड़े रखा। लंदन के हमारे प्रिय शायर सोहन राही के इन पंक्तियों में यही प्रेम झलकता है-

“कोयल कूक पपीहा वाणी, ना पीपल की छाँव।

सात समंदर पार बसाया हमने अपना गाँव।”   

(ठ) संस्कृति और धर्म: संस्कृति और धर्म में बहुत अंतर है। धर्म व्यक्तिगत होता है। धर्म का संबंध आत्मा और परमात्मा से है, जबकि संस्कृति का समाज की वस्तु होने के कारण आपस में व्यवहार की चीज है। संस्कृति धर्म से प्रेरणा लेती है और उसे प्रभावित करती है। धर्म को यदि ‘सरोवर’ तथा संस्कृति को ‘कमल’ की उपमा दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संस्कृति ही किसी भी राष्ट्र या समाज की अमूल्य संपति होती है। भारतीय संस्कृति व्यक्ति, समाज व राष्ट्र के जीवन को सिंचित कर उसे पल्लवित, पुष्पित तथा फलयुक्त बनाने वाली चिरप्रवाहित सरिता है। हमारी संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है ऐसा माना जाता है कि भारतीय संस्कृति यूनान, रोम, मिश्र, सुमेर और चीन की संस्कृतियों से भी प्राचीन है।

संस्कृति और सभ्यता:

संस्कृति और सभ्यता दोनों एक दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। फिर भी दोनों में मौलिक भिन्नता है और दोनों के अर्थ भी अलग-अलग हैं। संस्कृति का संबंध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से है। दूसरी ओर सभ्यता का क्षेत्र व्यक्ति और समाज के बाहरी स्वरुप से है। हिन्दू धर्म का नब्बे हजार वर्षों से भी अधिक का लिखित इतिहास है। लगभग बीस हजार वर्ष पूर्व नए सिरे से वैदिक धर्म की स्थापना हुई और नए सिरे से सभ्यता का विकास हुआ। प्रारंभ में ब्रह्मा और उनके पुत्रों ने इस धरा पर विज्ञान, संस्कृति और सभ्यता का विकास किया। इस दौर में शंकर और विष्णु सत्ता धर्म और इतिहास के केंद्र में थे। देवता और असुरों का काल अनुमानतः बीस हजार ईसा पूर्व से लगभग सात हजार ईसा पूर्व तक चला था। धरा जलप्रलय के बाद ययाति और मनु के काल और कुल की शुरुआत हुई। उत्तर भारत और दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न सभ्यताएँ नहीं थी, बल्कि एक ही सभ्यता के दो रूप थे। आर्य कोई जाती नहीं थी और ना ही वे कहीं बाहर से आये थे। हम सभी भारतीय द्रविड़ थे। स्थान और वातावरण के लंबे समय के चलते हमारे रंग-रूप में थोड़ा बहुत अंतर हो गया। हमारी सबसे पुरानी सभ्यता ‘नर्मदा घाटी की सभ्यता’ थी। प्राचीनतम नदी घाटी सभ्यता में इस सभ्यता का जिक्र कम ही किया जाता है। जबकि पुरातत्ववेताओं के अनुसार यहाँ भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता के अवशेष पाए गए हैं। इस सभ्यता के दो हजार वर्ष पुराने होने के प्रमाण मिले हैं। दूसरी सभ्यता ‘भीमबैठका’ सभ्यता थी। यहाँ भीम बैठते थे। इसलिए इन गुफाओं को भीमबैठका कहा जाता है। भीमबैठका ‘रातापानी अभ्यारण्य’ में स्थित है। तीसरी सभ्यता ‘महानदी सभ्यता’ थी। मानव सभ्यता का उद्भव और संस्कृति का प्रारंभिक विकास नदी के किनारे ही हुआ है। छत्तीसगढ़ और उड़ीसा कि सबसे बड़ी नदी महानदी का प्राचीन नाम चित्रोत्पला था। इसके अलावा इसे महानंदा और नीलोत्पला के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोशल के नाम से जाना जाता था। वनवास के समय रामजी दस वर्षों तक यहीं रहे थे। चौथी सभ्यता ‘दक्षिण भारत की सभ्यता’ थी। पुरातत्ववेता मानते हैं कि तमिल सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता थी। अरब कि खाड़ी में ऐसे दो नगर ढूंढे गए जो कि भारत के प्राचीन वैभव और इतिहास को प्रमाणित करते हैं। पाँचवी सभ्यता ‘गंगा सभ्यता’ थी। गंगा को भारतीय सभ्यता का पालक माना गया है क्योंकि गंगा हमारी माँ है। छठी सभ्यता ‘ब्रहमपुत्र नदी सभ्यता’ है। सभ्यता का उत्थान-पतन संस्कृति पर निर्भर करता है। भारतीय सस्कृति का अतीत गौरवपूर्ण होने के साथ-साथ बाहर के देशों तक रहा है। इसीलिए विश्व के अनेक देशों ने इस संस्कृति को अपनाकर इसे विश्व संस्कृति का गौरव प्रदान किया है। वर्तमान युग में भी विश्व के कोने-कोने में भारतीय संस्कृति की विरासत एवं गौरवशाली अतीत के प्रति असीम श्रद्धा विद्यमान है।

विश्व संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति (सार्वभौमिक स्वरूप) – भारतीय संस्कृतियों का विश्व में क्या स्थान है? यह जानना हमारे हमारे लिए आवश्यक है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में से एक है। अनेक विदावानों ने भी इसे प्राचीन संस्कृतियों की जननी माना है। मानव सभ्यता का मूल केंद्र भारत ही रहा है। मानव ने जैसे-जैसे अपना विकास किया वैसे-वैसे उसकी सभ्यता और संस्कृति क्षेत्र का भी विस्तार होता गया। इस विकासशील अवस्था में ही मानव मूल्यों और उसके आचार व्यवहारों में भी भिन्नता आती गई। विश्व के कई राष्ट्रों की संस्कृतियों में जो भिन्नता दिखाई देती है, उसका कारण है मानवीय वंशों की पृथकता। जब उनमे पारस्परिक संघर्ष हुए तब एक ने दूसरे के जीवंत उपादेय तत्वों को ग्रहण कर लिया और जब सामंजस्य हुआ तब भी उनमें इसी प्रकार आदान-प्रदान होता रहा। सामंजस्य की यही भावना इतनी घनिष्ठ हो गई कि वे एक दूसरे में हमेशा के लिए विलीन हो गए। इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं कि कई राष्ट्र नष्ट हो गए, किन्तु उनकी संस्कृति किसी न किसी रूप में सुरक्षित रही और अनुकूल परिस्थितियों में वह पुनः जीवित हो गई।

वृहद मानव संस्कृति में जो अनेकता का उल्लेख किया जाता है, उसका कारण परिस्थितियों की भिन्नता है। परिस्थितियों की भिन्नता ने ही समष्टि रूप में सनातन संस्कृति को राष्ट्र एवं समय की सीमाओं में आबद्ध किया है। भूमि, जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियाँ आचार-विचार, वेश-भूषा, भाषा, साहित्य और परम्पराएँ आदि संस्कृति के मूल उपज हैं। उनकी समानता से संस्कृति में एकता होती और विभिन्नता से अनेकता का दृष्टिकोण बनता है। एक ही वातावरण में एक ही विचार धारा के लोग, एक ही प्रकार के सुख-दुःख के साथ जीवन यापन करने वाले समाज का साहित्य भी प्रायः एक जैसा ही होता है। वास्तव में संस्कृति की एकता और अनेकता का मुख्य आधार अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ ही होती है।

विश्व संस्कृति के सन्दर्भ में, भारतीय संस्कृति में सिर्फ मानव मंगल की कामना की गई है। भारतीय संस्कृति ने एकता में अनेकता और अनेकता में एकता स्थापित कर मानव मंगल को परिमंडीत किया है। भारतीय संस्कृति के ये तीन शाश्वत तत्व- सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् ने मानव चेतना को सुसंस्कृत और परिष्कृत किया है। जैसे दर्शन में ‘सत्य’ के स्वरुप का, राजनीति में ‘शिव’ के स्वरुप का और ‘कला’ में सुन्दर स्वरुप का दिग्दर्शन हुआ है। इन तीनों मूलतत्वों का समाहार ही संस्कृति है, जिसके द्वारा मानवता का पूर्ण हित और कल्याण होता रहा है। जब कभी भी विश्व संस्कृति के सन्दर्भ में भारतीय संस्कृति का विषय उभरकर आता है, तब हमारे मन मस्तिष्क में ये तीनों शाश्वत तत्व विद्यमान हो जाते हैं।

भारत का ऐतिहासिक अतीत विश्व के समस्त राष्ट्रों के ऐतिहासिक अतीत से हमेशा भिन्न रहा है। इस्लामी, ईसाई, अरबी और यहूदी संस्कृतियों में सामाजिक जीवन के विकास की जो मान्यताएँ रहीं है, वे भारत के संस्कृति विकास की स्थितियों से बिल्कुल भिन्न है। इतिहास के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि इन राष्ट्रों की समस्याओं को विदेशी आक्रमणकारियों ने पराभूत कर दिया। किन्तु ठीक ऐसी ही परिस्थितियों के आने के बाद भी भारत ने अपनी संस्कृति को नष्ट नहीं होने दिया और उसके मूलरूप को भी बनाए रखा। इसलिए भारतीय संस्कृति सार्वभौमिक है।वसुधैव कुटुम्बकम- ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ में ‘वसुधा’ का अर्थ है- ‘पृथ्वी’ और ‘कुटुम्ब’ का अर्थ है ‘परिवार’, ‘कुनबा’ इस प्रकार ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अर्थ हुआ, सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है और इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्य और जीव-जंतु इस परिवार का हिस्सा हैं। भारतीय दर्शन का ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अथार्त सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है। यह विचार प्राचीन काल से ही भौगोलिक विस्तार के माध्यम से भारतीय संस्कृति के प्रसार और अन्य संस्कृतियों के साथ इसके अंतर्मिश्रण को प्रदर्शित करता है। व्यापार, विश्वविधालयों, मिशनरियों, बौद्धधर्म के प्रचार, भारतीय महाकाव्यों का प्रभाव, भारतीय दर्शन, प्रशासन और विधि जैसे विभिन्न साधनों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का प्रसार अन्य देशों में हुआ। भारतीय संस्कृति के इस प्रसार में व्यापारिक संबंधों का प्रभाव सर्वोपरि रहा है। इतिहास गवाह है कि भारत के महान विचारकों, संतों, साहित्यकारों एवं सम्राटों ने पूरे विश्व के कल्याण के लिए हमेशा प्रयास किया। चक्रवर्ती सम्राट अशोक को जब युद्ध से होने वाले हानि का ज्ञान प्राप्त हुआ तब उन्होंने आत्म शांति के लिए बौद्ध धर्म को अपना लिया और विश्व शान्ति के लिए निकल पड़े। यह परम्परा हमारी संस्कृति में युगों-युगों से चलती आ रही है।

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