ईश्वरचंद्र विधासागर

कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दिन मंगलवार को भड़की हिंसा के दौरान कॉलेज परिसर में स्थित महान दार्शनिक, समाजसुधारक और लेखक ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई थी। कलकता में यही एक ऐसा पहला निजी कॉलेज है, जिसे भारतीयों ने चलाया। इसमें पढ़ाने वाले शिक्षक भी भारतीय ही रहे। यहां तक कि कॉलेज का वित्तीय प्रबंधन का कार्य भी भारतीय ही करते थे। पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर के उत्साह, आकांक्षा और बलिदान के कारण, कॉलेज ने 1879 ई. में स्नातक स्तर तक की शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय को मान्यता प्राप्त कराई। बी एल कोर्स के लिए कॉलेज को 1882 में मान्यता मिली। इस कॉलेज के खुलने से उच्च शिक्षा में यूरोपियों का एकाधिकार समाप्त हो गया। कॉलेज के संस्थापक ईश्वरचंद्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई 1891 को हो गया था। इसके बाद साल 1917 में कॉलेज का नाम बदलकर विद्यासागर कॉलेज किया गया। इसी दौरान ये मूर्ति यहां स्थापित की गई थी। इस कॉलेज का उद्देश्य मध्यम वर्गीय हिंदुओं को कम से कम पैसों में उच्च शिक्षा प्रदान करना था। इस कॉलेज के शुरु होने से पहले तक उच्च शिक्षा के लिए भारतीयों को विदेश जाना पड़ता था लेकिन जिनके पास विदेश जाने के लिए पैसे नहीं होते थे, वे उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते थे।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के वीरसिंह गाँव में एक अति निर्धन दलित परिवार में हुआ था। पिता का नाम ठाकुरदास वन्द्योपाध्याय था। तीक्ष्णबुद्धि पुत्र को गरीब पिता ने विद्या के प्रति रुचि विरासत में प्रदान की थी। नौ वर्ष की अवस्था में बालक ने पिता के साथ पैदल कोलकाता जाकर संस्कृत कालेज में विद्यारम्भ किया। शारीरिक अस्वस्थता, घोर आर्थिक कष्ट तथा गृहकार्य के बावजूद ईश्वरचंद्र ने प्रायः प्रत्येक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। आरम्भिक आर्थिक संकटों ने उन्हें कृपण (कंजूस) की अपेक्षा ‘दयासागर’ ही बनाया। विद्यार्थी जीवन में भी इन्होंने अनेक विद्यार्थियों की सहायता की। समर्थ होने पर बीसों निर्धन विद्यार्थियों, सैकड़ों निस्सहाय विधवाओं, तथा अनेकानेक व्यक्तियों को अर्थ कष्ट से उबारा। वस्तुतः उच्चतम स्थानों में सम्मान पाकर भी उन्हें वास्तविक सुख निर्धन की सेवा में ही मिलता था। शिक्षा के क्षेत्र में वे स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। श्री बेथ्यून की सहायता से गर्ल्स स्कूल की स्थापना किया, जिसके संचालन का भार भी उनपर था। उन्होंने अपने ही व्यय से मेट्रोपोलिस कालेज की स्थापना की। साथ ही अनेक सहायता प्राप्त स्कूलों की भी स्थापना कराई। संस्कृत अध्ययन की सुगम प्रणाली उन्होंने निर्मित किया। इसके अतिरिक्त शिक्षा प्रणाली में अनेक सुधार किए। समाज सुधार उनका प्रिय क्षेत्र था। जिसमें उन्हें कट्टर पंथियों का तीव्र विरोध सहना पड़ा। वे विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे। शास्त्रीय प्रमाणों से उन्होंने विधवा विवाह को बैध प्रमाणित किया। पुनर्विवाहित विधवाओं के पुत्रों को 1865 के एक्ट द्वारा वैध घोषित करवाया। अपने पुत्र का विवाह विधवा से ही किया। संस्कृत कालेज में अब तक केवल ब्राह्मण और वैद्य ही विद्योपार्जन कर सकते थे। अपने प्रयत्नों से उन्होंने समस्त हिन्दुओं के लिए विद्याध्ययन के द्वार खुलवाए। साहित्य के क्षेत्र में बँगला गद्य के प्रथम प्रवर्त्तकों में एक थे। उन्होंने 52 पुस्तकों की रचना की, जिनमें 17 संस्कृत में थी, पाँच अँग्रेजी भाषा में, शेष बँगला में। जिन पुस्तकों से उन्होंने विशेष साहित्यकीर्ति अर्जित किया वे हैं, ‘वैतालपंचविंशति’, ‘शकुंतला’ तथा‘सीतावनवास’। इस प्रकार मेधावी, स्वावलंबी, स्वाभिमानी, मानवीय, अध्यवसायी, दृढ़प्रतिज्ञ, दानवीर, विद्यासागर, त्यागमूर्ति ईश्वरचंद्र ने अपने व्यक्तित्व और कार्यक्षमता से शिक्षा, साहित्य तथा समाज के क्षेत्रों में अमिट पदचिह्न छोड़े। वे अपना जीवन एक साधारण व्यक्ति के रूप में जीते थे। दान पुण्य के अपने काम को एक राजा की तरह करते थे। वे घर में बुने हुए साधारण सूती वस्त्र धारण करते थे, जो उनकी माता जी बुनती थीं। वे झाडियों के वन में एक विशाल वट वृक्ष के सामान थे। क्षुद्र व स्वार्थी व्यवहार से तंग आकर उन्होंने अपने परिवार के साथ संबंध विच्छेद कर दिया और अपने जीवन के अंतिम 18 से 20 वर्ष बिहार (अब झारखण्ड) के जामताड़ा जिले के करमाटांड़ में संथाल आदिवासियों के कल्याण के लिए अपने को समर्पित कर दिया। उनके निवास का नाम ‘नन्दन कानन’ (नन्दन वन) था। उनके सम्मान में अब करमाटांड़ स्टेशन का नाम ‘विद्यासागर रेलवे स्टेशन’ रख दिया गया है।

वे जुलाई 1891 में दिवंगत हुए। उनकी मृत्यु के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा-, “लोग आश्चर्य करते हैं कि ईश्वर ने चालीस लाख बंगालियों में कैसे एक मनुष्य को पैदा किया” उनकी मृत्यु के बाद, उनके निवास “नन्दन कानन” को उनके बेटे ने कोलकाता के मलिक परिवार को बेच दिया। इससे पहले कि “नन्दन कानन” को ध्वस्त कर दिया जाता, बिहार के बंगाली संघ ने घर-घर से एक-एक रूपया अनुदान एकत्रित कर 29 मार्च 1974 को उसे खरीद लिया। उसमें  बालिका विद्यालय पुनः प्रारम्भ किया गया, जिसका नामकरण विद्यासागर के नाम पर किया गया है। निःशुल्क होम्योपैथिक क्लिनिक स्थानीय जनता की सेवा कर रहा है। विद्यासागर के निवास स्थान के मूल रूप को आज भी व्यवस्थित रखा गया है। सबसे मूल्यवान सम्पत्ति लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी ‘पालकी’ है जिसे स्वयं विद्यासागर प्रयोग करते थे। उनके बचपन का नाम ईश्वर चन्द्र बन्दोपाध्याय था। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध पाण्डित्य के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी। उनकी माँ भगवती देवी भी नारी शिक्षा की समर्थक थी। उनके प्रयास से ही कलकता एवं अन्य स्थानों में बहुत अधिक बालिका विद्यालयों की स्थापना हुई।

समाज के प्रति उनका योगदान और उनकी विनम्रता ने उन्हें पूरे भारत में एक प्रसिद्ध और सम्मानित व्यक्तित्व बना दिया था। एक बार की बात है ईश्वरचंद्र विधासागर अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर कलकता में विश्वविधालय खोलने के लिए, इस मिशन पर काम कर रहे थे। इसके लिए वे लोगों से दान माँग रहे थे। इसी कार्य के लिए एक दिन वे अयोध्या के नवाब के महल में गए। ईश्वरचंद्र के साथियों ने उन्हें मना किया था क्योंकि नवाब दयालु व्यक्ति नहीं था। ईश्वरचंद्र नवाब के सामने अपनी कमी को प्रस्तुत किए थे। उनकी बातों को सुनकर नवाब ने ईश्वरचंद्र के दान थैली में अपना जूता डाल दिया। ईश्वरचंद्र ने उनका धन्यवाद किया और वापस चले गए। दुसरे दिन ईश्वरचंद्र ने नवाब के महल के सामने ही नवाब के जुते की नीलामी का आयोजन कर दिया। नवाब को प्रभावित करने के लिए नवाब के ही जागीरदार और अदालत के कुछ लोग आगे आए और बोली लगाने लगे। नवाब का जूता 1000 रुपया में बिक गया। यह सुनकर नवाब बहुत खुश हुआ।         

बांग्ला भाषा के गद्य को सरल एवं आधुनिक बनाने का उनका कार्य सदा याद किया जायेगा। उन्होंने बांग्ला लिपि के वर्णमाला को भी सरल एवं तर्क सम्मत बनाया। बँगला पढ़ाने के लिए उन्होंने सैकड़ों विद्यालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिन्तन का अध्ययन भी आरम्भ किया। सन् 2004 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार उन्हें ‘अब तक का सर्वश्रेष्ठ बंगाली’ माना गया है।

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