कवि गंग (रीतिकाल)

कवि गंग रीतिकालीन काव्य धारा के प्रथम महत्वपूर्ण कवि थे। ये उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के एकनार गाँव के निवासी थे। इनका मूल नाम गंगाधर था। ये जाति के ब्राह्मण थे तथा सम्राट अकबर के प्रमुख दरबारी कवि थे। इसके अतिरिक्त ये रहीम खानखाना, राजा बीरबल, राजा मानसिंह तथा टोडरमल के भी प्रिय थे। कवि गंग के विषय में यह कहा गया है कि वे बड़े ही स्वाभिमानी थे। उनके विषय में कहा गया हैः

उत्तम पद कवि गंग के कविता को बलवीर।

केशव अर्थ गँभीर को सूर तीन गुन धीर।।

कवि गंग का जन्म और निधन की तिथि तथा जन्म स्थान विवादास्पद है। वैसे ये इकनौर (जिला इटावा) के ब्रह्म भट्ट कहे जाते हैं। शिवसिंह सेंगर के आधार पर मिश्रबंधुओं ने इनका जन्म सं. 1512 ई० और इनका रचनाकाल सं. 1612 ई० माना है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इनका जन्म 17 वीं शताब्दी के विक्रमी का अंत मानते हैं। इनका निधन संवत् 1662 ई० और 1665 ई० के बीच हो सकता है।

अकबर तथा उनके दरबार के अन्य कवि जैसे- राजा बीरबल, कवि रहीम, राजा मानसिंह, टोडरमल आदि इनका बहुत ही आदर करते थे। अकबर के दरबारी कवियों में महाकवि गंग प्रमुख थे। कवि रहीम के तो वे परम प्रिय थे। एक बार कवि गंग ने रहीम की प्रशंसा में एक छप्पय लिखा। इस छप्पय में कवि गंग ने कवि रहीम के योद्धा रूप का वर्णन किया था। इसपर प्रसन्न होकर कवि रहीम ने इस छप्पय पर उन्हें 36 लाख रुपए भेंट किए थे। रहीम की दानशीलता पर कवि गंग ने यह दोहा लिखकर भेजा-

सीखे कहां नवाबजू, ऐसी दैनी देन।

ज्यों-ज्यों कर उंचा करो त्यों-त्यों नीचे नैन।।

रहीम ने गंग कवि की बात का उतर बड़ी ही विनम्रतापूर्वक देते हुए यह दोहा लिखकर भेजा-

देनदार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।

लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन।।

अकबर अपने दरबारी कवियों का बहुत सम्मान करता था। उस समय अकबर के दरबार के बाहर तुलसीदास और दरबार के अन्दर कवि गंग सबसे अच्छे और सुकवि माने और कहे जाते थे। अकबर कवि गंग को सिर्फ एक ‘वाक्य’ या एक ‘शब्द’ दिया करता था। उसी एक ‘वाक्य’ या ‘शब्द’ से कवि गंग तुरंत अपनी काव्य रचना करके अकबर को सुना देते थे। एक बार अकबर ने कवि गंग को “आस अकबर की” शब्द से काव्य रचने के लिए कहा तो गंग कवि ने तुरन्त ये रचना अकबर को सुना दिया।

मृगनयनी की पीठ पैबेनी लसै, सुख सज सनेही समोही रही।

सुची चीकनी चारू चुभी चित मैं, भरि भौन भरी खुसबोई रही।।

कवि गंग जू या उपमा जो कियो, लखि सुरति या श्रुति गोई रही।

मनो कंचन के कदली दल पै, अति साँवरी साँपिन सोई रही।।

कवि गंग कई जगह अपनी रचना के द्वारा अकबर को अपमानित कर दिया करते थे, इसका एक उदहारण है-

रति बिन राज रति बिन काज, रति बिन छाजत छत्र न टीकौ

रति बिन मात रति बिन तात, रति बिन होत न जोग जति कौ

रति बिन साधु रति बिन संत, रति मानस लागत फीकौ

कवि गंग कहै सुण शाह मूरख, नर एक रति बिन एक रति कौ

गंग कवि, अकबर के दरबार में रहकर समस्याओं का हल किया करते थे। कवि गंग की छापधारी स्फुट रचनाएँ उपलब्ध हैं जिनमें प्रशस्तियाँ और हास्य व्यंग्य की चुभती उक्तियाँ भी हैं। गंग पदावली, गंगपचीसी और गंग रत्नावली नाम से इनकी रचनाएँ संगृहीत पायी गई हैं। शृंगार, वीर आदि रसों की इनकी उक्तियाँ वाग्वैदग्ध्य पूर्ण एवं प्रभावकारी हैं। इनकी आलोचनात्मक एवं व्यंग्यपरक उक्तियाँ मार्मिक, निर्भीक और स्पष्ट हैं। ‘चंद छंद बरनन’ की महिमा नामक खड़ी बोली का एक ग्रंथ भी इनका लिखा बताया जाता है। गंग की कविता अलंकार और शब्द वैचित्र्य से भरपूर है। साथ ही उसमें सरसता और मार्मिकता भी है। भिखारीदास जी ने कवि गंग के विषय में कहा है- ‘तुलसी गंग दुवौ भए, सुकविन में सरदार।’

उनकी रचनाओं को शब्दों के सारल्य के साथ-साथ वैचित्र्य, अलंकारों का प्रयोग और जीवन की व्याहारिकता अत्यन्त रसमय एवं अद्भुत बना देते हैं। व्यक्ति की प्रतिभा और योग्यता पर कवि गंग कहते है-

तारों के तेज में चंद्र छिपै नहिं, सूर्य छिपै नहिं बादल छाये।

चंचल नारि के नैन छिपें नहिं, प्रीत छिपै नहिं पीठ दिखाये।

जंग छिड़े रजपूत छिपै नहिं, दाता छिपै नहिं याचक आये।

‘गंग’ कहें सुन शाह अकब्बर कर्म छिपै न भभूत लगाये॥

मनुष्य के विवेक का वर्णन करते हुए कवि गंग कहते है –

बाल के खाल ख्याल बड़े से विरोध अगोचर नार से ना हासिये,

अजा से लाज, अगन से जोर, अजाने नीर में ना धसिये,

बेल कू नाथ, घोड़े कु लगाम, हस्ती को अंकुश से कसिये,

कवि गंग कहे सुन शाह अकबर, क्रूर से दूर सदा बसिये,

संतो की महिमा का वर्णन करते हुए कवि गंग कहते है-

तात मिले पुनि मात मिले, सुत भ्रात मिले युवती सुखदाई।

राज मिले गज बाज मिले, सब साज मिले मनवांछित पाई।

लोक मिले परलोक मिले, विधि लोक मिले वैकुण्ठ जाई।

सुन्दर और मिले सब सुख ही सुख, संत समागम दुर्लभ भाई।

मित्रता पर कवि गंग कहते हैं –

गंग तरंग प्रवाह चले और कूप को नीर पियो न पियो ,

अबे हिर्दे रघुनाथ बसे तो और न नाम लियो न लियो,

कर्म संयोग सुपात्र मिले तप कुपात्र को दान दियो न दियो,

कवि गंग कहे सुन शाह अकबर एक मूरख मित्र कियो न कियो।

बुरे कर्मो के विषय में कवि गंग कहते हैं –

दिन छुपे तथवर घटे और सूर्य छुपते घेर्ण को छायो,

गजराज छुपत है सिंह को देखत चंद्र छुपत अमावाश आयो,

पाप छुपे हरी नाम को जपत कुल छुपे है लापुत को जायो,

कवि गंग कहे सुन शाह अकबर कर्म न छुपेगो छुपे छुपायो

इसी प्रकार नारी से प्रीत लगाने के विषय में कवि गंग कहते है

चंचल नार की प्रीत न कीजे प्रीत किये दुःख हे भारी,

काबु काल परे कबु आन बने नारी की प्रीत हे प्रेम कटारी,

लोह को घाव दारू से मिटे अरु दिल को घाव न जाए बिसारी

कवि गंग कहे सुन शाह अकबर नारी की प्रीत अंगार से भारी।          

उनकी रचनाओं में जीवन का यथार्थ स्पष्ट रूप से झलकता है। इस यथार्थ को, कि “गाँठ में रुपया होने से सभी लोग चाहने लगते हैं”। आज के भौतिक जीवन में हम सब आर्थिक समस्याओं से घिरे हैं, जिसके पास पैसा है उसी की हर जगह पूछ है, पर कवि गंग ने अपने विवेक से उस काल में भी अपनी कविता में इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा है –

माता कहे मेरो पूत सपूत, बहिन कहे मेरो सुन्दर भैया।

बाप कहे मेरे कुल को है दीपक, लोक लाज मेरी के है रखैया॥

नारि कहे मेरे प्रानपती हैं, उनकी मैं लेऊँ निसदिन ही बलैया।

कवि गंग कहे सुन शाह अकबर, गाँठ में जिनकी है सफेद रुपैया॥

सामाजिक बुराईयों और कुरीतियों पर कटाक्ष करते हुए कवि गंग कहते हैं:

“एक बुरो प्रेम को पंथ, बुरो जंगल में बासो
बुरो नारी से नेह बुरो, बुरो मूरख में हँसो
बुरो सूम की सेव, बुरो भगिनी घर भाई
बुरी नारी कुलक्ष, सास घर बुरो जमाई
बुरो ठनठन पाल है, बुरो सुरन में हँसनों
कवि गंग कहे सुन शाह अकबर, सबते बुरो माँगनो”

रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥
रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको।
‘गंग कहै सुन शाह अकबर, एक रती बिन पाव रती को॥


एक को छोड़ बिजा को भजै, रसना जु कटौ उस लब्बर की।
अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥
कवि ‘गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की।
जिनको हरि की परतीत नहीं, सो करौ मिल आस अकबर की॥

उपरोक्त रचना की अंतिम पंक्ति अकबर को अपमान जनक लगी इसलिए अकबर ने कवि गंग को उसका साफ अर्थ बताने के लिए कहा। कवि गंग इतने स्वाभिमानी थे कि उन्होंने अकबर को यह जवाब दियाः

“एक हाथ घोड़ा एक हाथ खर
कहना था सो कह दिया करना है सो कर”

कवि गंग अत्यन्त स्वाभिमानी थे। उनकी स्पष्टवादिता के कारण ही उन्हें हाथी से कुचलवा दिया गया था। अपनी मृत्यु के पूर्व कवि गंग ने कहा थाः

कबहूँ न भडुआ रण चढ़े, कबहूँ न बाजी बंब,

सकल सभाहि प्रणाम करि, विदा होत कवि गंग।“ कवि गंग का साहित्य प्रारंभिक दौड़ का साहित्य है। कवि गंग की रचनाएँ जन मानस को आनंदित करने के साथ-साथ उन्हें प्रेरित भी करती हैं। कवि गंग का साहित्य हिंदी साहित्य के लिए ऐतिहासिक महत्व रखती है तथा साहित्य के काव्य जगत का दिशा निर्देशन भी करती है।

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