‘शब्दों’ का खेल निराला

शब्द में बहुत बड़ी शक्ति होती है कबीर दास जी ने सच ही कहा है- “शब्द सम्भारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव। एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव”।। ‘शब्द’ स्वयं गूंगा है, स्वयं मौन रहता है शब्द स्वयं तो चुप रहता है, दूसरे के द्वारा बोला जाता है    शब्द दुःख का… Continue reading ‘शब्दों’ का खेल निराला

गाँव तो गाँव होना चाहिए (कविता)

गाँव तो गाँव होना चाहिए, नदियाँ, पोखर और तालाब होनी चाहिए। बुजुर्ग बरगद ‘बाबा’ की सेवा होनी चाहिए, हर डाल पर गिलहरियों का बसेरा होना चाहिए। सभी परिंदों की भी अपनी घोंसले होनी चाहिए, उल्लुओं और झींगुरों की आवाज आनी चाहिए। न उजारे हम बाँस के बसवारी को, जिससे चरचराहट की आवाज आनी चाहिए। बचा… Continue reading गाँव तो गाँव होना चाहिए (कविता)

राजा ‘भर्तृहरि’

राजा भर्तृहरि प्राचीन उज्जैन के महाप्रतापी राजा और संस्कृत के महान कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध थे। इनके शतकत्रय (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक) की उपदेशात्मक कहानियाँ भारतीय जन मानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। इनके प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ… Continue reading राजा ‘भर्तृहरि’

लक्ष्मी पुत्र ‘गणेश’

गणेश चतुर्दशी का त्योहार भारत के सभी राज्यों में अपने-अपने विधि अनुसार  हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पुरानों के अनुसार यह त्योहार गणपति बाप्पा के जन्मदिन के शुभ अवसर पर मनाया जाता है। महाराष्ट्र में ‘गणेश पूजा’ जगत प्रसिद्ध है। यह उत्सव भाद्रपद मास की चतुर्थी से लेकर अनन्त चतुर्दशी तक मनाया जाता है।… Continue reading लक्ष्मी पुत्र ‘गणेश’

हिन्दी अभियान (कविता)

हिन्दी है अभिमान देश का हिंदी है स्वाभिमान देश का अनुपम और अति दिव्य है अति सरल है, अति सरस है हिन्दी है अब शान देश का हिन्दी है अभिमान देश का । उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम हिन्दी ही है जान देश का चारों दिशाओं चारों ओर को   जोड़ने का अभियान देश का ।।

‘हिन्दी’ का जख्म’ (कविता)

मैं ‘हिन्द’ की ‘हिन्दी रानी’ अपनों से ही जख्मी हूँ । मैं क्या कहूँ ऐ हिन्द वासियों समझो मेरी जख्मों को मैं हिन्दी हूँ अपनों से ही जख्मी हूँ । भूल गए मुझे अपने लोग अंग्रेजी को ही समझते अपनी शान । मुझसे होकर दूर अंग्रेजी की बढ़ाते हैं मान वाह रे कुदरत! तेरी कैसी… Continue reading ‘हिन्दी’ का जख्म’ (कविता)

जम्मू-कश्मीर : कुछ यादें

आज सत्तर वर्षो के बाद भारत पूर्णरूप से स्वतंत्र हुआ है। इस दिन का इंतजार हर भारतवासी को था और मुझे भी। मैं तो इस दिन का इंतजार तक़रीबन सैंतीस वर्षों से कर रही थी। आशा तो नहीं था कि कभी जम्मू-कश्मीर से 370 और 35A हटाया जा सकेगा लेकिन हमारे प्रधान मंत्री, गृह मंत्री… Continue reading जम्मू-कश्मीर : कुछ यादें

गुड़िया (संस्मरण)

सबसे पहले भगवान से यह प्रार्थना करती हूं कि हे! प्रभु, हे! भगवान किसी के जीवन में ऐसा दुःख नहीं देना जिससे वह उबर नहीं सके। यह भी कहा जाता है कि भगवान जब दुःख देता है तब उस दुःख से उबरने के लिए रास्ते भी वही बनाता है, या कहें कि हिम्मत भी वही… Continue reading गुड़िया (संस्मरण)

सुषमा स्वराज (कविता)

सुषमा जी नारी में नारायणी थी, देशवासियों की वह प्यारी थी। वाणी में सरस्वती का वाश था, ‘शब्दों’ में उनके ओज थी।     व्यक्तित्व उनके निराले थे, वो जनमानस की सहारा थी दुश्मन उनसे भय खाते थे    लक्षमी और दुर्गा की मूरत थी ‘सोने में सुहागा’ सुषमा थी। सुषमा सत्य में स्वराज्य थी।

हम हंसना भूल गए हैं (कविता)

अपने आप में इतना उलझ गए हैं कि  हम हंसना भूल गए हैं। दूसरों की खुशी देखकर, हम अपने सुख को भूल गए हैं। इसलिए.... दुसरों की बुराई देखने में, हम अपनी बुराई भल गए हैं। इसलिए.... मोबाईल में समय गवांकर, हम अपनों से दूर ही गए हैं। इसलिए.... सुख कि खोज में गाँवों को… Continue reading हम हंसना भूल गए हैं (कविता)