सच्ची घटना (कहानी) दोषी कौन

हमारे जीवन में चाहे जो भी घटनाएं घटती है। हम बिना कुछ सोचे-समझे भगवान को दोषी बना देते है। आज मैं जिस घटना की चर्चा करने जा रही हूं वह आंखों देखी है। करीब चालीस साल पहले की बात है। मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता था। उस परिवार में एक बेटा और दो बेटियाँ थीं। परिवार के सभी लोग अच्छे और सुलझे हुए थे। बच्चे पढने में अच्छे थे। बेटा आई.आई.टी की तैयारी कर रहा था। दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी। वे सब भी अपने-अपने परिवार में सुख से रह रहीं थीं। दुसरे वर्ष उनके बेटे ने आई.आई.टी का इंट्रेंस टेस्ट दिया। कुछ महीनों बाद उसकी रिजल्ट आई। इस खबर को सुनकर सभी आस-पड़ोस के लोग बहुत खुश हुए लेकिन जिसके घर में ये खुशियां आई थी उस घर में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। हुआ यह कि जिस लड़के ने आई.आई.टी की परीक्षा पास की थी वह रिजल्ट सुनते ही पागल की तरह व्यवहार करने लगा। पहले तो सब सोंच रहे थे कि शायद खुशी से यह ऐसा कर रहा है लेकिन ये सच नहीं था। उस बच्चे और परिवार के जीवन में हमेशा के लिए अंधेरा छा गया। वह बच्चा सच में— हो गया था। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने बच्चों में बचपन से ही दोनों तरह की परिस्थितियों के लिए तैयार करना अति आवश्यक है। जिसकी वे सामना कर सकें। यहां दोषी कौन है? “भगवान, भाग्य या माता-पिता”। जो भी हो इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उस बच्चे की तथा उस परिवार का भविष्य अब भगवान के ही हाथ में था।  

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